गाय के नाम पर भीड़ द्वारा हुई कुछ हिंसात्मक घटनाओं को लेकर जन्तर-मंतर पर गले में तख्ती लटकाए विरोध प्रदर्शन कई दिन पहले सबने देखा था। इसे लिंचिज का नाम दिया था हर किसी की तख्ती पर लिखा था ‘‘नॉट इज माय नेम’’ ये सब वह लोग थे जो दादरी में अखलाक, हरियाणा में जुनेद की मौत से दुखी थे। ये लोग बार-बार नारा लगा रहे थे कि धर्म और गाय के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय यानि के मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा की जा रही है। असल में नेता और मीडिया जिसे साम्प्रदायिक हिंसा कहती है, अब बंगाल उसकी चपेट में है। कई दिन से 24 परगना के बशीरहाट में किसी एक फेसबुक पोस्ट से क्रु( मुसलमान उपद्रव और हिंसा में लिप्त हैं। यह हिंसा इतनी ज्यादा है कि स्कूल और दुकानें बंद हैं और सुरक्षा बल लगातार गश्त लगा रहे हैं। हिंसा में दुकानों को जलाया और बर्बाद किया गया है जो ज्यादातर हिन्दुओं की हैं। 

 

जलती दुकान, जलते मकान, बेघर सुबकते लोग मन में सवाल लिए जरूर घूम रहे होंगे कि क्या बंगाल में हिन्दू होना गुनाह है? ममता बनर्जी जब सत्ता में आइंर् तब उनका नारा था माँ, माटी और मानुष लेकिन जिस तरह उनके वर्तमान कार्यकाल में वर्ग विशेष द्वारा हिंसा हो रही है उसे देखकर कोई भी आसानी से कह देगा कि राज्य में उनका नारा ‘माँ, माटी और मौलवी’ ही बनकर रह गया। अब तक राज्य की खबरों से मालूम होता है कि उपद्रवी मुसलमानों की भीड़ ही हमलावर रही है, हिन्दू इसमें शरीक नहीं हुए हैं। इस कारण इसे दंगे के बजाय सिर्फ मुस्लिम हिंसा का नाम देना भी गलत नहीं होगा। फेसबुक पर पोस्ट डालने वाला लड़का गिरफ्तार हो गया। फिर भी हिंसा हुई। यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ्तारी से मुसलमानों की आहत भावना संतुष्ट नहीं हुई है तो इसमें सवाल पैदा होते हैं आखिर वे चाहते क्या थे? क्या उस लड़के को उसी वक्त सजा दी जानी चाहिए थी और क्या वह सजा भीड़ देती? लेकिन क्या उसके ऐसा करने से हिंसा न होती? मालदा, धुलागढ़ और अब बशीरहाट बंगाल का मुस्लिम क्या यही चाहता है कि हर चीज सड़क पर निबटाई जाये? 

 

ऐसा इसलिए नहीं है कि इस राज्य में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति कभी बनती ही नहीं बल्कि इसलिए कि उनकी खबरें कभी बाहर ही नहीं आती थीं। कम से कम पिछले एक हफ्ते तक तो यही सूरत थी बंगाल में मुसलमान दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा तादाद में हैं। राजनीतिक दलों में भी वे दिखलाई पड़ते हैं। स्थानीय स्तर पर भी वे दब कर नहीं रहते बल्कि चढ़कर रहते है पिछले साल मालदा में भी इसी तरह पैगम्बर मोहम्मद और मजहब के अपमान से गुस्साए मुसलमानों ने सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया था। सड़क पर गाड़ियों को आग लगाते मुसलमानों की तस्वीरें खूब घूमती रहीं इससे यह लोग क्या साबित करना चाहते हैं सिर्फ यही कि मुसलमानों को मौका दो और देखो? बशीरहाट में मुसलमान बहुसंख्या में हैं। वहां प्रसाशन मौन बना रहा मीडिया की माने तो पूरे प्रकरण में जिस तरह वहां राज्य सरकार खामोश रही इसे देखकर भी लोग अपनी-अपनी सुविधानुसार अंदाजा लगा सकते हैं।

 

सरकारी शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति वोट के लालच में सरकार को देखने नहीं देती कि यह बीमारी उसके भीतर मौजूद है। लेकिन यहाँ तो बंगाल के सबसे प्रभावशाली समाचार समूह ने भी इस हिंसा की खबर नहीं बनने दी। धूलागढ़ हिंसा की खबर को भी इसी तरह दबाने की कोशिश हुई थी। हालाँकि इस बार खबरें बाहर आ रही हैं। हद से कुछ सेकुलरवाद से प्रभावित नेता इस घटना की निंदा करने के बजाय उल्टा केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि अल्पसंख्यकां के खिलाफ काम कर रहे हैं। पर इसमें भी जो मुद्दे उठा रहे हैं, वह धर्म को लेकर ही हैं। ये अफसोस की बात है 2017  में भी आकर इस्लाम को महमूद गजनवी के चश्मे से और तैमूर की आंखों से ही देखा जा रहा है। जोकि इतिहास का एक हिस्सा भर थे। जब थे, तब थे. जहां थे, वहां थे अब किस बात का स्वांग?

 

इस मामले में मुस्लिम लेखक ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है कि अगर आप मुसलमान हैं और आपको मेरी बात बुरी लग रही है तो जान लीजिये कि आप पूरी तरह से अरबी दादागिरी की गिरफ्त में हैं। ये सब धर्म नहीं है। ये राजनीति है और शुद्ध राजनीति। अरबों का इस्लाम, धर्म नहीं है. मस्जिदों में इस्राईल को बद्दुआ देना मजहब नहीं है। ग्यारह साल के बच्चे को एक कार्टून के लिए दोष देना और उस वजह से पचासों लोगों की दुकानें जला देना मजहब नहीं है। ये राजनैतिक दादागिरी है और आपके धर्म का ढांचा कुछ नहीं अब सिर्फ राजनीति है। बस गड़बड़ ये हुआ कि आपकी इस दादागिरी को लोगों ने अब तक सहा है तो आपको ये अपने धर्म का हिस्सा लगने लगा है।

 

वह आगे लिखते हैं इसे मजहब कहते हैं आप? शर्म नहीं आती है आपको खुद को मुसलमान कहते हुए? बांग्लादेश में आपने कितने ब्लागर बच्चों को मार दिया, पाकिस्तान में  ईशनिंदा के नाम पर कितनो को मार दिया और यहां चूंकि आपका बस नहीं चल रहा है तो आप दुकानें जला कर काम चला ले रहे हैं ये बिमारी बहुत ही गहरी है और ये बिमारी बढ़ती हीजा रही है। इसलिए क्योंकि सारी दुनिया ने इसे स्वीकार कर लिया। तुम आक्रामक बने रहे और लोग इसे स्वीकार करते रहे। ये मजहब है कि सारी दुनिया आपसे डरे? ये मजहब है कि वहां लोग चैन से न जी पायें जहां आप बहुसंख्यक हो जाएं? इस खूंखार मानसिकता को मजहब कहते हुए आपकी जबान नहीं जलती है? दादागिरी और मजहब में फर्क समझिये। जल्दी समझिये क्योंकि दुनिया का भरोसा और सब्र अब टूट रहा है।

----राजीव चौधरी

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