आर्य समाज से हिन्दुओं को दूर करने में लगे हैं - स्वामी अग्निवेश

मुस्लिम अवामी कमेटी ओरंगाबाद महाराष्ट्र द्वारा एक सभा में

                श्री अग्निवेश ने कहा -  देश में रहना है तो वन्दे मातरम् कहना होगा, यदि मुझसे कोई कहे तो मैं वन्दे मातरम् नहीं कहूँगा।

यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले मन्दिर की कोशिश की तो सबसे पहले मैं विरोध करूँगा ।

चोटी, दाड़ी के नाम पर आदित्यनाथ योगी, सारे योगी और भोगी देश को बाँट रहे हैं।

यदि राम मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई तो तुलसी, शिवाजी, दयानन्द, विवेकानन्द ने क्यों नहीं इसका उल्लेख किया ?

क्या राम के जन्म के समय उनका जन्म आड़वानी देख रहे थे ?

वन्दे मातरम् के संबंध में हाई कोर्ट जजों की वन्दे मातरम् की टिप्पणी पर भी व्यंग्य किया।

 

हमारे आर्य समाज के सन्यासी सनातन धर्म की रक्षा, उसका विस्तार और साम्प्रदायिक विचारधारा की अज्ञानता से समाज की रक्षा करने में लगे रहे और आज भी कुछ लगे हैं। धर्मान्तरण से हिन्दू समाज की रक्षा और सत्य सनातन वैदिक धर्म का प्रचार मुख्य रूप से उनका उद्देश्य रहा हैं। सनातन धर्म से विमुख हुए व्यक्तियों की शुद्धि करके उन्हें पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित करना और नव आगन्तुक अन्य सम्प्रदाय के व्यक्तियों को भी जोड़ना यह कार्य भी हमारे सन्यासी वृन्द के माध्यम से होते रहे हैं।

 

जब-जब सनातन धर्म विरोधी आवाज कहीं से उठी आर्य समाज सदा आगे बढ़ा और उनकी रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी दी। स्वतन्त्रता के पूर्व देश की राजनीति के क्षितिज पर पहचान बनाने वाले स्वामी श्रद्धानन्द ने कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध में और हिन्दू पिछड़े वर्ग की सुरक्षा के लिए उठाए कदमों का सर्वप्रथम प्रस्ताव अमृतसर के कांग्रेस अधिवेशन में रखा था। महात्मा गांधी, पं. मोतीलाल नेहरू से भी अधिक कर्मठ व जन जन में प्रसिद्धी के सम्मान को हिन्दू समाज की रक्षा के लिए त्याग दिया।

 

अनेक सन्यासी मजहबी कट्टरता के विरूद्ध कार्य करते हुए बलिदानी हो गए। इसी कारण समस्त हिन्दू समाज आर्य समाज को अपना रक्षक, हितैषी मानता रहा। ऐसे अनेक वीतराग सन्यासियों निज स्वार्थ को कभी निकट नहीं आने दिया संगठन के लिए जिए, संगठन के लिए कुर्बानियां देते रहे, संगठन का निज स्वार्थ में उपयोग नहीं किया। 

 

किन्तु आज इसके विपरीत राजनीति में लिप्त और लोकेष्णा में पूरी तरह डूबे श्री अग्निवेश आर्य समाज की छबि बिगाड़ने में लगे हैं। कितनी ही बार अपने कार्य कलापों और सस्ती लोकप्रियता के वशीभूत उनके द्वारा दिए गए हिन्दू विचारधारा के विरूद्ध विवादास्पद भाषणों के कारण आर्य समाज संगठन को हिन्दू समाज  का आक्रोश और उपेक्षा सहन करना पड़ी, बाद में सफाई देना पड़ी।

 

आज तक कुरान पर या इस्लाम या क्रिश्चियन सम्प्रदाय द्वारा हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन पर, चार निकाह, जेहाद, हज जैसी किसी बात पर अपनी जबान नहीं खोली। किन्तु हिन्दुओं के देवी देवता, पूजा स्थलों, त्यौहारों पर टीका टिप्पणी करते हुए अनेकों बार हिन्दूओं की भावनाओं के विपरीत अपने उद्गार व्यक्त किए। इससे सनातन धर्म की विरोधी साम्प्रदायिक ताकतों को संबंल मिला और हिन्दुओं में निराशा भाव आये। सत्यार्थ प्रकाश, वेद, राम मन्दिर, अमरनाथ यात्रा, समलैंगिगता, नक्सलवादियों के प्रति प्रोत्साहन देते हुए डिवेट में कई बार आर्य समाज की मान्यता के विरूद्ध बोलते रहे। कुछ साल पूर्व जम्मू कश्मीर के समस्त हिन्दू एक लम्बी लड़ाई साम्प्रदायिकता के विरूद्ध लड़ रहे थे, उस समय श्री अग्निवेश ने हिन्दू विचारधारा के विरूद्ध साम्प्रदायिक संगठनों की पीठ थप थपाई। इस कारण हिन्दू आर्य समाज के प्रति घृणा भाव रखने लगे। जम्मु के आर्य समाजियों के सामने बड़ा संकट आ गया, उन्होंने तत्काल वहां की स्थिति बताते हुए सभा से किसी को आने का कहा तब सार्वदेशिक सभा की ओर से जाकर मीडिया में श्री अग्निवेश की बातों का खण्डन कर हिन्दू संगठन के सहयोग की बात कही। मुस्लिमों की सुरक्षा, ईसाईयों की सुरक्षा की वकालात और राष्ट्र विरोधी कार्यों में लिप्त जे. एन. यू. का समर्थन श्री अग्निवेश द्वारा अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की भावना से किया। स्वामी रामदेव व अन्ना हजारे के आन्दोलन में उनके मंच पर बैठकर उन्हीं के विरूद्ध कार्य किया, अन्ना के विरूद्ध मंच के पीछे से ही मोबाईल पर कांग्रेस के एक बड़े नेता से अन्ना के विरूद्ध फोन पर चर्चा करते हुए टी. वी. पर लाखों ने देखा और भत्र्सना की। पंजाब में जाकर सत्यार्थ प्रकाश में से कुछ भाग निरस्त करने की बात कही।

 

आज तक सैकड़ों हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों के संबंध में, काश्मीर से कनेरा, यू. पी., हरियाणा के पलायन कर चुके लाखों हिन्दुओं के लिए या जबरन सनातन धर्मियों के धर्म परिवर्तन करवाने की घटना के संबंध में कभी श्री अग्निवेश ने कुछ नहीं कहा। हिन्दुओं पर अत्याचार पर कभी कुछ नहीं कहा क्योंकि सत्ताधारी पक्ष को प्रसन्न रखना महत्वपूर्ण था। गौ हत्यारों के पक्ष में हिन्दुओं पर निशाना साधा गया, किन्तु कभी गौ हत्या के विरोध में एक शब्द नहीं कहा गया।

 

आर्य समाज के भले ही सैद्धान्तिक कुछ दूरिया हिन्दू सनातन धर्मियों से रही हों किन्तु सहयोग के लिए हमेशा आर्य समाज तैयार रहा। मिनाक्षीपुरम् में मन्दिर के अस्तित्व को साम्प्रदायिक विचारधारा वालों ने नष्ट कर दिया था। तात्कालीन सभा प्रधान श्री स्वामी आनन्दबोध सरस्वती ने पुनः वहां मन्दिर स्थापित करवाया। राम मन्दिर के संबंध में सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के द्वारा तात्कालीन प्रधान श्री कैप्टन देवरत्नजी आर्य थे, उस समय एक सार्वदेशिक सभा सदस्यों के अतिरिक्त विशिष्ट आमन्त्रित विद्वानों की अन्तरंग सभा में राम जन्म भूमि के आन्दोलन को सहयोग देने का निर्णय सर्वानुमति से लिया था।

 

किन्तु इसके विरूद्ध दिनांक 28/07/2017 को महाराष्ट्र मुस्लिम अवामी कमेटी ओरंगाबाद महाराष्ट्र द्वारा एक सभा में राम मन्दिर और राम जन्म भूमि को लेकर एक बेहद निम्न स्तर की हास्यास्पद टिप्पणी श्री अग्निवेश ने हजारों मुस्लिम समुदायों के व्यक्तियों के बीच की। जिसे तमाम श्रोता जो मुस्लिम समाज के ही थे बड़ी जोर से तालियां बजाकर हंसते हुए राम जन्म स्थल का मजाक उड़ाया।

 

भारत के वरिष्ठ एवं राष्ट्रीय स्तर मे सम्मानित जन प्रतिनिधि नेता श्री आडवानी पर भी हास्या स्पद टिप्पणी की, जिसका समस्त श्रोता जो मुस्लिम ही थे उन्होंने मजाक उड़ाया, तालियां बजाई।

 

अपने भाषण में श्री अग्निवेश ने राम जन्म स्थल पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए उनके जन्म के संबंध में जो भद्दी टिप्पणी की वह असहनीय व शर्मनाक है। वे कहते हैं राम का जन्म कब हुआ था किसको मालूम है, क्या प्रमाण है कि यहीं राम जन्म हुआ जहां से नमाज पढ़ी जाती थी। पुनः कहते है जहां राम का जन्म हो रहा था, क्या उस समय अडवानी (आँखों पर हाथ रख चश्में या दूरबीन से देखने का अभिनय करते हुए बताया) देख रहे थे ? आगे कहा यदि 1845 में राम मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई यदि यह सही है तो तुलसी, शिवाजी, दयानन्द, विवेकानन्द ने क्यों नहीं लिखा ?

 

आगे कहा, ये बोलते हैं सौगन्ध राम की खाते हैं हम मन्दिर वहीं बनायेगें। ये हिन्दुओं की गन्दी सियासत है, मुल्क तोड़ने व बांटने की गन्दी सियासत है, हम इसे स्वीकार नहीं करते।

 

इस प्रकार देश विदेश के, करोड़ों हिन्दू समाज के राम से आस्था रखने वाले व्यक्तियों की भावना का खुला मजाक मुस्लिम समाज द्वारा आयोजित एक बड़ी सभा में श्री अग्निवेश द्वारा किया गया। (जो सज्जन इन बातों की पुष्टि करना चाहें वे बीडियो से देख सकते हैं)

 

देश में रहना है तो वन्दे मातरम् कहना होगा, यदि ऐसा हो तो मैं वन्दे मातरम् नहीं कहूँगा । हाई कोर्ट द्वारा वन्दे मातरम् पर दिए आदेश की टिप्पणी करते हुए कहा ये जजों को कहाँ से सपना आ गया, उन्हें फैसले करना चाहिए। अपने भाषण में महाराष्ट्र के एक मुस्लिम विधायक द्वारा वन्दे मातरम् न कहने पर विवाद, हो रहा है, विधायक पद निरस्त करने की मांग राष्ट्रवादी विचारधारा के व्यक्ति कर रहे हैं। किन्तु श्री अग्निवेश ने अपने भाषण में कहा जबरजस्ती कोई किसी को यदि न्यायालय भी जबरन मुझसे वन्दे मातरम् कहने का कहे तो मैं उसे कभी नहीं मानूंगा ।

 

आप सोच सकते हैं कि ऐसा भाषण दिया जाना खुले रूप में राष्ट्रीयता का अपमान और साम्प्रदायिकता को किस तरह से बढ़ावा देने वाला है।

 

इस प्रकार मुस्लिम समाज द्वारा आयोजित सभा में जाकर हिन्दुओं की भावना के और राष्ट्रीय विचारधारा के विरूद्ध जब एक अपने को सन्यासी कहने वाला व्यक्ति वह भी अपने को आर्य समाजी कहे तो आर्य समाज के बारे में आम हिन्दू क्या सोचेगा ? इस प्रकार के प्रयास से तो हिन्दू आर्य समाज से और दूरी बना लेगा, यह विष वमन और साम्प्रदायिक ताकतों का सहयोगी होगा, यह प्रयास श्री अग्निवेश कर रहे हैं। इस संबंध में ओरंगाबाद के तमाम हिन्दू संगठनों में रोष है और आर्य समाज के व्यक्ति किसी तरह उन्हें शान्त व आश्वस्त कर रहे हैं। सन्यासी के कर्तव्यों की अव्हेलना कर और एक सन्यासी का चरित्र अपनाए बिना मात्र भगवा वस्त्र धारण कर और सत्तारूढ़ सरकार के संवरक्षण से जीने वाला कोई भी जीवन सन्यासी के रूप में स्वीकार योग्य नहीं हो सकता।

 

अपने जीवन में वेद प्रचार, यज्ञ, संगठन शक्ति का विस्तार, धर्म रक्षा, गौ रक्षा, सनातन संस्कृति से दूर प्रायः अनेक राजनैतिक दलों की सदस्यता समय समय पर बदलना एक सन्यासी का आचरण नहीं है। सुना है अभी अभी फिर श्री अग्निवेश ने जे. डी. यू. की सदस्यता ग्रहण की है। क्या एक सन्यासी का यही चरित्र होना चाहिए। आर्य समाज के कार्य शेष नहीं है, कोई काम अब नहीं बचा।

 

अपनी ऐसी ही येषणाओं के कारण श्री अग्निवेश द्वारा आर्य समाज के संगठन को भी नहीं छोड़ा। सार्वदेशिक सभा दिल्ली कार्यालय पर बलात अवैधानिक खुली दादागिरी से कब्जा कर तात्कालीन शासन प्रशासन के सहयोग से जो क्षति पहुंचाई वह अकथनीय है। राजनैतिक पार्टियों जैसा षड़यन्त्र और विचारधारा के वशीभूत संगठन को तोड़ने का कार्य किया। स्वनिर्मित तथाकथित पद पर वे चाहे जब आ जाते हैं, या चाहे जब किसी और को आगे करके अपनी योजना चलाते रहे। जब पूरे देश के आर्यों ने नकार दिया तो फिर पीछे हटकर किसी को आगे कर दिया, यह एक सोची समझी योजना के अन्तर्गत चल रहा है।

 

मेरे आर्य बन्धुओं, आर्य समाज की स्थिति हमसे छिपी नहीं है उसका कारण है हम ऋषि को मानते है उसकी नहीं मानते, उसका चित्र लगाते हैं, संस्थाओं के नाम भी रखते हैं, जयकारा भी लगाते हैं। यह सब पौराणिकों के समान चित्र पूजा और चरित्र उपेक्षा के समान हो रहा है ऋषि के जीवन में सत्य ही था किन्तु हम उसके अनुयायी उसके विपरीत सही को सही कहना भूल गए, सत्य और असत्य को समान दर्जा भी हम कहीं कहीं औपचारिकता और व्यवहार की मधुरता को सामने रखकर दे रहे हैं। त्यागी व लोभी को, स्वार्थी और परमार्थी को, एक ही तराजू में तौल रहे हैं। गलतियों को क्षमा करने की भूल पृथ्वीराज ने की थी, जिसका खामियाजा हम अब भुगत रहे हैं, किन्तु हम भी उसी को दोहरा रहे हैं। सत्य का त्याग व चापलूसी अथवा कपड़ों के रंगों से भ्रमित होते रहे तो अपने को आर्य कहना इस शब्द की गरिमा को नष्ट करता है।

 

समाज के लिए जो समर्पित हैं उनको स्थान देना हम सबका नैतिक कर्तव्य है। किन्तु जो संगठन के साथ खेल रहा हो, भ्रमित कर रहा हो, लोकेष्णा के कारण संगठन का अहित कर रहा हो उसको यदि नहीं समझा, उसको भी संगठन में स्थान देते रहे तो संगठन के लिए इससे बड़ा धोखा नहीं हो सकता। यथायोग्य वर्तना चाहिए, यह महर्षि दयानन्द ने एक सन्देश दिया उसको ही मान लेवें तो संगठन की विकृति दूर हो जावेगी।

---प्रकाश आर्य

     सभामन्त्री सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली

 

 

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