पर खिलजी तो अभी भी जिन्दा है

महारानी पद्मावती को लेकर पिछले काफी दिनों से देश के नेता, पत्रकार और इतिहासकार अतीत के काल खण्ड पर बहस किये बैठे हैं। मुद्दा है फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली की आगामी फिल्म पद्मावती। कहा जा रहा है कि इस फिल्म में कुछ आपत्तिजनक जनक सीन है जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस कारण राजनीति और फिल्म का बाजार गर्म है। साथ ही सवाल भी उठ रहे कि भारत का इतिहास अब फिल्म निर्माता लिखेंगे या राष्ट्रवादी कलमकार? इसमें पहली बात तो यह है कि हमारे भारत का मध्यकाल का इतिहास बहुत ही पीड़ादायक रहा है जिसके कारण यहाँ अनेक कुरूतियों का जन्म हुआ, सतियों ने अपने सम्मान की खातिर अपनों प्राणों को अग्नि की दहकती भट्टियों में स्वाह किया। अनेक राजाओं, वीरों और गुरुतेगबहादुर जैसे भारत माँ के सपूतोंं ने अपने सिर मुस्लिम हमलावरों के सामने झुकाने के बजाय कटा दिए ताकि इस देश का अस्तित्व, इसका धर्म और संस्कृति बची रहे।

 

महाराणा प्रताप और अकबर को लेकर पिछले दिनों नेतागण भिड़ते दिखाई दिए, टीपू सुल्तान को लेकर जुबानी जंग चली, ताजमहल पर बयानों के ताज नेताओं के सर पर खूब सजे, इस बार भी पद्मावती को लेकर एतिहासिक संघर्ष जारी है। हरियाणा के एक नेता ने तो फिल्म निर्माता के सिर काटने की धमकी के साथ आवेश में आकर 10 करोड़ का इनाम भी बोल दिया। लेकिन यदि इस पूरे मामले पर गौर करें तो देखेंगे कि एक भी बयान खिलजी के ऊपर आया हो? तत्कालीन सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी द्वारा भारत के बहुसंख्यकों हिन्दुओं पर किए गए अत्याचारों के खिलाफ किसी ने कोई बयान दिया हो? इतिहास का मध्यकाल भारत के तन-मन को तोड़ने की  दुःख भरी कहानी है। इस कथा के तथ्य विदेशी हमलावरों के खूनी चरित्र का जिन्दा दस्तावेज भी हैं। लेकिन आज उसे धर्मनिरपेक्षता के धागों में पिरोकर पहनाया जा रहा है।

 

सूरज के उदय और अस्त होने के साथ-साथ काल गुजरता गया, देश को आजादी मिली हम आधुनिकता और स्वतंत्रता के रथ पर एक संविधान लेकर सवार हुए लेकिन 70 वर्ष के बाद एक बार फिर हम 721 वर्ष पूर्व हुए हजारों सतियों के बलिदान के इतिहास को लेकर खड़े हैं। लेकिन इस बात को कौन भूल सकता है कि बर्बर सुल्तान ने चित्तौड़ को घेर लिया था। जिस कारण राणा रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मावती को आग में कूदना पड़ा था। यह सब इसी इतिहास का आदर्श सत्य है पर फिल्म और राजनीति का बाजार इतिहास नहीं अपना फायदा देख रहा है। सात सौ साल पहला खिलजी भी गलत था जो रानी पद्मावती को जबरन पाने की कोशिश में लगा था पर सवाल ये भी है कि आज के आधुनिक खिलजी कहाँ तक सही हैं जो आये दिन बहन-बेटियों को हड़पने की कोशिश में लगे हैं?

 

इसी वर्ष की कुछ बड़ी घटनाओं पर नज़र डालें तो जुलाई माह में दिल्ली में यमुनापार के मानसरोवर पार्क इलाके में आदिल उर्फ मुन्ने खान ने रिया गौतम पर ताबड़तोड़ चाकू से वार किर दिया था। खिलजी की तरह एकतरफा प्यार में सनकी आशिक ने रिया गौतम की हत्या कर दी थी। सड़क पर पब्लिक देखती रही और आरोपी दिन दहाड़े एक लड़की को हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा कर गया था। इसके बाद उसी माह उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक और खिलजी अदनान खान ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर हिना तलरेजा की रेप के बाद हत्या कर दी थी। इसी माह जमशेदपुर के मेडीट्रीना हास्पिटल में मैनेजर के पद पर कार्यरत चयनिका कुमारी की हत्या डॉ. मिर्जा रफीक ने इस वजह से कर दी क्योंकि वह उसका मजहब स्वीकार नहीं कर रही थी। दो दिन पहले मुजफ्फनगर में एक अन्य खिलजी उबैद उर रहमान उर्फ कबीर ने एक लड़की को अपने परिवार के साथ मिलकर जबरन जहर दे दिया। ऐसी दो चार नहीं हर दूसरे तीसरे दिन किसी न किसी रूप में कोई न कोई पद्मावती इन आधुनिक खिलजियों का शिकार हो रही हैं।

 

हृदय नारायण दीक्षित ने जागरण सम्पादकीय में सही लिखा है कि इतिहास बोध राष्ट्र निर्माण का मुख्य सूत्र है। अलाउद्दीन खिलजी हुकूमत का समय सिर्फ सात सौ साल पुराना है। विवादित फिल्म की कथा इसी हुकूमत का एक अंश है। खिलजी हुकूमत की शुरुआत जलालुद्दीन खिलजी से हुई। उनके पूर्वज तुर्किस्तान से भारत आए थे। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव ने ‘भारत का इतिहास’ में लिखा है, ‘हिन्दुओं का दमन करने की उसकी नीति क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं, अपितु निश्चित विचारधारा का अंग थी।’ सर वूज्ले हेग ने लिखा है ‘हिन्दू संपूर्ण राज्य में दुख और दरिद्रता में डूब गए.’ इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि समाज के प्रतिष्ठित लोग ‘अच्छे कपड़े नहीं पहन सकते थे।’ इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने लिखा ‘अलाउद्दीन वास्तव में बर्बर अत्याचारी था। उसके हृदय में न्याय के लिए कोई जगह नहीं थी।’ भंसाली ने इन तथ्यों को जरूर पढ़ा होगा। इतिहास का आदर्श सत्य है और बाजार का सत्य मुनाफा। तो रानी पद्मावती के चरित्र को कोई कैसे अपने मुनाफे का सौदा बना सकता हैं?

 

खिलजी का उद्देश्य राणा रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मिनी को पाना था। इस पर इतिहासकारों में मतभेद हैं। डॉ. के.एस. लाल व हीरा चंद्र ओझा आदि ने इसे सही नहीं माना। सुल्तान को कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। अमीर खुसरो ने पूरा युद्ध देखा था। उसने लिखा है कि केवल एक दिन में तीस हजार राजपूत मारे गए थे। सुल्तान ने भयंकर रक्तपात किया। विजय के बाद उसने चित्तौड़ का नाम अपने पुत्र के नाम पर खिजराबाद रखा। रानी पद्मावती भी युद्ध में शामिल थीं। उन्होंने हजारों राजपूत स्त्रियों के साथ ‘जौहर’ बलिदान किया। यह बात अलग है कि रानी पद्मावती इतिहास की पात्र हैं या नहीं, लेकिन भारत में वह श्रद्धा  की पात्र जरूर हैं वह इतिहास की एक आदर्श नारी है वह कोई राजनीति की गाय या बकरी का मुद्दा नहीं जिस पर इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा बहस की जाए!

 

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