त्रैतवाद का सिद्धान्त

एक युवक बैठे - बैठे आईने में अपने ही आपको निहार रहा था,निहारते ही जा रहा था, घंटों हो गए लेकिन उसकी आँखें आईने से अलग हो ही नहीं रही थी ।पहली नज़र में तो मुझे भी लगा कि यह चेहरे को क्यों  देखता  रहता है ! आजकल के युवा बस अपने चेहरे के पीछे ही लगे रहते हैं, इसी को सजाने संवारने में ही सारा दिन तो क्या, कुछ लोग तो सारा जीवन ही बिता देते हैं। लेकिन उस युवक के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, वो युवक अन्य युवकों से बिलकुल अलग ही सोच रखनेवाला था । एका-एक मैं चौंक गया जब उसने मुझसे यह पूछा कि आचार्य जी ! आखिर मैं कौन हूँ ? क्या मैं आईने में जो दिख रहा हूँ यही हूँ ? क्या मैं अपने आप में ही हूँ या किसी ने मुझे बनाया है ? युवक के इन सामान्य से सवालों में बहुत ही गूढ़ रहस्य छिपा हुआ था। इन प्रश्नों पर विचार करने से एक बात समझ में आई कि हमें तीन चीजों के बारे में जानना या विचार करना बहुत ही जरुरी है, पहला- मैं कौन हूँ ? दूसरा- ये जो शरीर दिख रहा है, यह कौन है ? तीसरा- इस शरीर को रंग–रूप देनेवाला, बनाने वाला कौन है ?

 

उस युवक की जिज्ञासा से मेरा मन भी प्रभावित हो गया और मैं अपने आप से ही यह प्रश्न करने लगा कि आखिर इस प्रकार की बातें कितने लोगों के मन में आती हैं ? क्या उस युवक के मन में जिस प्रकार आइना देखते समय यह विचार आया ठीक ऐसे ही सभी मनुष्यों को विचार नहीं करने चाहिए, क्या इस प्रकार के सवाल मन में नहीं लाने चाहिए । यदि हर व्यक्ति के मन में इस प्रकार का प्रश्न उत्पन्न हो जाये जिसको कि शास्त्रीय शब्द में ‘आत्मभाव-भावना’ कहा जाता है ।अर्थात् केवल अपने अस्तित्व से सम्बन्धित भावना.विचार या चिन्तन भी यदि हम करें तो हमारे मन में उठने वाले इस प्रकार की अनेक शंकाओं का निवारण तथा जीवन में भी होने वाली अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है ।

 

तो अंत में इन तीन चीजों को जानना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि इन्हीं से ही हमारा तथा सारे संसार का व्यवहार वा व्यापार चल रहा है । इन तीनों को जाने बिना कोई भी व्यक्ति सर्वथा नितांत सुखी नहीं हो सकता । तो ये तीन चीजें कौन सी हैं ? पहली है – मैं अर्थात् जीवात्मा, दूसरी है – यह शरीर अथवा यह शरीर जिससे बना है अर्थात् प्रकृति, और तीसरी है – जिसने यह शरीर बनाया अर्थात् ईश्वर ।वास्तव में देखा जाये तो पुरे संसार में ये तीन चीजें ही हैं , इन से अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं, जिनको कि जानना आवश्यक हो ।

 

तीन प्रकार के पदार्थ होते हैं पहला साध्य- अर्थात् सिद्ध करने योग्य अथवा प्राप्त करने योग्य पदार्थ जो कि हमारा लक्ष्य या गन्तव्य होता है, दूसरा है साधक- अर्थात् साध्य को प्राप्त करने वाला व्यक्ति और तीसरा है साधन- जिसकी सहायता से साध्य को प्राप्त किया जाता है । हम यह अनुभव करते हैं कि कोई भी, कभी भी लेश मात्र भी दुःख कि इच्छा नहीं करता किन्तु प्रत्येक प्राणि सदा सुख की ही कामना करता है । इससे ज्ञात होता है कि हमारा लक्ष्य सुख प्राप्ति ही है और ईश्वर के सुख स्वरुप और सुख प्रदाता होने से वह सुख हमें केवल ईश्वर से ही प्राप्त हो सकता है अतः ईश्वर ही हमारा लक्ष्य अथवा साध्य है। हम स्वयं सभी जीवात्मा साधक हैं जो कि सुख के लिए प्रयत्नशील हैं और प्रकृति हमारे लक्ष्य कि सिद्धि में सहायक होने से साधन है। इन तीनों सत्ताओं में भेद यह है कि ईश्वर और जीव चेतन तत्त्व हैं अर्थात् ज्ञान गुण युक्त हैं और प्रकृति जड़ तत्त्व अर्थात् ज्ञान रहित है । ईश्वर सर्वज्ञ है और जीवात्मा अल्पज्ञ है । प्रकृति और जीवात्मा आनन्द से रहित हैं तथा ईश्वर ही आनन्द से युक्त है। ईश्वर सर्वत्र व्यापक है, जीवात्मायें एकदेशी हैं और प्रकृति कुछ सीमा तक फैली हुई है । इन तीन प्रकार के पदार्थों को ‘ त्रैत ’ कहते हैं और इनके अस्तित्व वा विद्यमानता रूप सिद्धांत को ही  त्रैतवाद  का सिद्धान्त कहा जाता है। उस युवक को जो मैंने समझाया था, आइये हम भी इस त्रैतवाद के सिद्धान्त को जानने-जनाने व समझने-समझाने का प्रयत्न करते हैं ।

 

सबसे पहले हम स्वयं से ही प्रारम्भ करते हैं । हम दिन भर के व्यवहार में ‘ मैं ’ शब्द का प्रयोग अनेकों बार करते हैं लेकिन अनेक लोगों को यह पता ही नहीं होता कि ‘मैं कौन हूँ’ - ?। मैं – कहने से हम ऐसा मानते हैं कि यह दृश्यमान शरीर ही है जिसके साथ हम ‘ मैं ’ का व्यवहार करते हैं ।जैसे कि मैं मोटा हूँ – पतला हूँ, मैं गोरा हूँ – कला हूँ, मैं लम्बा हूँ – नाटा हूँ इत्यादि । हमें यह वास्तविक ज्ञान होना चाहिए कि मैं – रूप सत्ता का स्वरुप क्या है ? मैं शब्द किस वस्तु का वाचक है ? आज कल के वैज्ञानिक कहलाने वाले बुद्धिजीवी वर्ग भी भले ही मनुष्य जीवन को सरल- सुगम बनाने के लिए अनेक प्रकार के संसाधनों का निर्माण व खोज कर लिया हो परन्तु स्वयं के विषय में इनको लेश मात्र भी वास्तविक ज्ञान नहीं है। जब हम किसी व्यक्ति से पूछते हैं कि आप कौन हैं- ? तो इसके उत्तर में वह यह बताता है कि मैं अमुक नाम का व्यक्ति हूँ, जैसे कि मैं देवदत्त हूँ, मैं यज्ञदत्त हूँ इत्यादि अथवा यह बताता है कि मैं डाक्टर हूँ, मैं शिक्षक हूँ, मैं मंत्री हूँ, मैं वकील हूँ, मैं इन्जीनियर हूँ, इत्यादि। इससे यह ज्ञात होता है कि हम शरीर को ही मैं मानकर समस्त व्यवहार कर रहे हैं ।

 

इसी प्रकार का एक प्रेरक प्रसंग स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के जीवन में भी देखने में आता है जब स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने मथुरा में दंडी गुरु स्वामी विरजानंद जी का दरवाज़ा खटखटाया तो अन्दर से आवाज़ आई कि- ‘आप कौन हैं’ - ? तब स्वामी दयानन्द जी का बड़ा ही मार्मिक व सार-गर्भित उत्तर था कि – ‘यही तो जानने आया हूँ कि- मैं कौन हूँ’ । वास्तव में मैं कोई दृश्यमान शरीर नहीं हूँ क्योंकि मृत्यु के समय भी यह दृश्यमान शरीर तो विद्यमान रहता ही है परन्तु ‘मैं’ कहने वाला कोई नहीं रहता । यदि मैं शरीर होता तो मृत्यु के बाद भी मैं - मेरे का व्यवहार कर लेता लेकिन ऐसा होता नहीं है ।यदि इस शरीर से कोई पृथक तत्त्व को हम स्वीकार नहीं करते तो इस संसार में पाप-पुण्य,धर्म-अधर्म,न्याय-अन्याय,आदि व्यवहार का कोई मतलब ही नहीं रह जाता, क्योंकि यह शरीर तो नष्ट ही हो जायेगा।

 

जब हम कोई भी परोपकार का कार्य करते हैं अथवा एक सैनिक जब अपने देश के लिए अपना प्राण तक न्योच्छावर कर देता है तो वह इस सिद्धान्त के आधार पर ही कार्य करता है कि मैं नित्य हूँ,नष्ट होने वाला नहीं हूँ,आगे भी विद्यमान रहूँगा और इन पुण्य कर्मों के फल स्वरुप मुझे अगले जन्म में सुख तथा सुख के साधन प्राप्त होंगे ।इस सिद्धान्त के विपरीत यदि हम सब नष्ट ही  हो जायेंगे तो क्यों भला कोई व्यक्ति पुण्य या धर्माचरण करना चाहेगा। सांख्यकार महर्षि कपिल जी कहते हैं कि “शरीरादिव्यतिरिक्तः पुमान्” (सांख्य.-1-104),अर्थात् स्थूल शरीर से लेकर सूक्ष्म प्रकृति पर्यन्त जितने भी जड़ (अचेतन) पदार्थ हैं उन सब से सर्वथा पृथक तत्त्व है पुरुष जीवात्मा । इससे पता चलता है कि मैं-मेरा का व्यवहार करने वाला इस शरीर से कोई भिन्न ही तत्त्व है। न मैं शरीर हूँ, न मैं पुरुष हूँ, न मैं स्त्री हूँ, न मैं बालक हूँ, न मैं वृद्ध हूँ, न मैं गोरा हूँ, न मैं काला हूँ, न मैं मोटा हूँ, न मैं पतला हूँ, इस प्रकार समस्त शारीरिक लक्षणों से रहित हूँ। मैं एक चेतन सत्ता हूँ जो कि सभी प्रकार के विषयों का ज्ञान करने में समर्थ है। मैं आत्मा ही हूँ ।

 

यह न केवल दर्शन, उपनिषद् और वेद आदि ग्रन्थों का ही प्रतिपाद्य विषय रहा है बल्कि सदा से ऋषि- मुनियों का, विद्वान्-मनीषियों का भी जिज्ञासा व चिन्तन-मनन का केन्द्रभूत विषय रहा है। श्रीमद् भागवत गीता में आत्मा के विषय में कहा है कि – नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।(गीता 2.23) इसका अर्थ है आत्मा को न किसी अस्त्र-शस्त्र से काटा जा सकता है, न ही उसको अग्नि जला सकती है, जल उसको न भिगो सकता है और न ही वायु उसको सुखा सकती है । न्याय दर्शन में आत्मा के स्वरुप के विषय में महर्षि गौतम जी ने कहा है कि ‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनो लिंगमिति’ (न्याय- 1-1-10) अर्थात् इच्छा, द्वेष=वैर, प्रयत्न=चेष्टा, सुख-दुःख=इन का अनुभव करना, तथा ज्ञान आदि  सभी गुण आत्मा को पहचानने के लक्षण हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि चेतन आत्मा एक ऐसी विद्यमान सत्ता है जो कि एक निश्चित स्थान मनुष्य, पशु, पक्षी आदि शरीर में रहता हुआ सभी प्रकार के कार्यों का संपादन करते रहता है और जिसके चले जाने से शरीर कोई काम का नहीं रहता।

 

अब हम शरीर के विषय में विचार करते हैं ।शरीर पांच भूतों से बना हुआ है अर्थात् ये भौतिक अथवा प्राकृतिक है।यह शरीर तीन प्रकार का होता है।एक है स्थूल शरीर,जो कि हाथ, पैर, शिर आदि दृश्यमान पांच भौतिकी है दूसरा है सूक्ष्म शरीर, जो कि पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच तन्मात्रा, मन, बुद्धि, और अहंकार, इन अठारह तत्त्वों का समाहार है और तीसरा है कारण शरीर जो कि इस शरीर का मूल कारण सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का समाहार रूप है । अब इस शरीर को बनाने वाले के विषय में विचार करें । शरीर को देखने से ही ज्ञात होता है कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने ही इसको ये रूप-रंग प्रदान करके बहुत सुन्दर और आकर्षक बनाया है । जो व्यक्ति जिस पदार्थ को बनता है उसको उस पदार्थ विषयक सब प्रकार का ज्ञान होना आवश्यक है । परिक्षण से पता चलता है कि इस शरीर विषयक कुछ भी हमें ज्ञान नहीं होता ।कौन सा यन्त्र या पुर्जा कहाँ जोड़ा गया है,किस प्रकार सुनियोजित किया गया है अन्दर क्या-क्या प्रक्रिया हो रही है इसका लेश मात्र भी परिज्ञान हमें नहीं है। इससे पता चलता है कि हमसे भी कोई तीव्र बुद्धिमान है जो कि इन सब प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित बनाकर संचालित कर रहा है ।

 

यह भी हम अनुभव करते हैं कि चाहते हुए भी हम अपनी इच्छा अनुसार कोई शरीर न धारण कर सकते हैं और न ही कोई फेर-बदल कर पाते हैं और न ही कोई आतंरिक क्रियाओं के ऊपर नियन्त्रण कर पाते हैं। इस प्रकार विचार करने से अन्तिम में हम स्वयं से भिन्न कोई दूसरी सत्ता को स्वीकार करने में विवश हो जाते हैं और उसी को हम ईश्वर नाम से सम्बोधन करते हैं। इस प्रकार समग्र विश्व ब्रह्माण्ड में ये तीन ही सत्ता विद्यमान हैं। किसी भी विषय को स्वीकार करने में यह आवश्यक है कि वह प्रमाणों से सत्य सिद्ध होता हो । प्रमाणों में भी मुख्यतः प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, इन तीन प्रमाणों को प्रबल माना जाता है । तो आइये जानने का प्रयत्न करते हैं कि इन तीन पदार्थों के विषय में क्या-क्या शब्द प्रमाण उपलब्ध हैं ।

 

वेदों में ऐसे अनेक मन्त्र उपलब्ध हैं जिनसे यह सिद्ध हो जाता है कि ये तीन पदार्थ स्वतः सिद्ध हैं। द्वा सुपर्णा सयुजा सखाय समानं वृक्षं परिषष्वजाते तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशिती । इस मन्त्र में द्वा सुपर्णा शब्द से दो चेतन तत्त्व को स्वीकार किया गया है और उनमें से एक पिप्पलं स्वादु अत्ति से जीवात्मा को निर्देश किया गया है जो कि संसार में रहते हुए भोगों को भोगता है और दूसरी एक चेतन सत्ता है ईश्वर जो कि अनश्नन् अर्थात् भोगों को भोग न करता हुआ अभिचाकशिती अर्थात केवल साक्षी मात्र रूप में देखते रहता है। इस मन्त्र में वृक्ष शब्द से तीसरी प्रकृति को लक्षित किया गया है। अर्थात इस मन्त्र में तीनों पदार्थों को स्वीकार किया गया है। ठीक ऐसे ही बालादेकमणीयस्कमुतैकं नैव दृश्यते, ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया।(अथर्व.10.8.25) इस प्रस्तुत मन्त्र में बालादेकं अणीयस्कं अर्थात् बाल से भी सूक्ष्म कह के प्रकृति का निर्देश किया है, ‘एकं नैव दृश्यते’ शब्द से जीवात्मा को निर्देशित किया गया है और ‘देवता सा मम प्रिया’ शब्द से ईश्वर को निर्देशित किया गया है।

 

योग दर्शन में भी तीन तत्त्वों को पृथक पृथक सत्ता वाला स्वीकार किया गया है जैसे कि – क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः (योगदर्शन-1-24)अर्थात् अविद्या आदि पांच क्लेश, सकाम कर्म, जन्म-आयु-भोग रूपी फल और संस्कार आदि से युक्त जीवात्मा होता है और इन सब से रहित ईश्वर होता है। ‘द्रष्टा दृशिमात्र शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्य’ (योग सूत्र) अर्थात् जीवात्मा केवल द्रष्टा रूप है, बुद्धि वृत्ति के अनुरूप देखने वाला, शुद्ध स्वरुप है। और प्रकृति के विषय में कहा है कि – भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यं (योग सूत्र) अर्थात् भूत और इन्द्रिय स्वरुप वाली जीवात्मा को भोग व अपवर्ग दिलाने वाली प्रकृति होती है। इससे यह सिद्ध होता है कि दर्शन शास्त्रकारों ने भी त्रैतवाद के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। योगदर्शन के भाष्यकार महर्षि व्यास जी ने भी तीनों की सत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘अथ प्रधान पुरुषः व्यतिरिक्तः कोऽयम् ईश्वरो नाम इति’(योगसूत्र अवतरणिका- 1-24 ) । अर्थात् प्रकृति और जीवात्मा से भिन्न यह तीसरा ईश्वर नामक पदार्थ कौन है ? इस प्रकार उपनिषद् में भी ऋषि ने कहा कि – अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः, अजोह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः। (श्वेताश्वेतरोपनिषद – 4-5) । यहाँ भी तीनों को अज अर्थात् अनुत्पत्ति वाला कहा है ।

 

किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति में तीन कारण होना आवश्यक है यथा निमित्त कारण,उपादान कारण,और साधारण कारण। निमित्त कारण वही होता है जो कि उस वस्तु को बनाने वाला है, उपादान कारण वही है जिससे पदार्थ को बनाया जाता है और साधारण कारण वही होता है जो पदार्थ की उत्पत्ति में सहायक होता है । जैसे कि घड़े की उत्पत्ति में कुम्भार निमित्त कारण,मिट्टी उपादान कारण और दण्ड-चक्र आदि साधारण कारण कहलाते हैं ।  इस सृष्टि कि उत्पत्ति में भी ईश्वर मुख्य निमित्त कारण है, जीव साधारण निमित्त है और प्रकृति उपादान कारण है तथा दिशा,काल,आकाश आदि साधारण कारण कहलाते हैं । परन्तु इन तीनों का कोई कारण उपलब्ध नहीं होता अर्थात् ये तीनों उत्पन्न ही नहीं होते अतः अनादि हैं और अविनाशी हैं।

 

हम सामान्य व्यवहार में भी देखते हैं कि एक दुकान को चलाने के लिये तीन चीजों कि महती आवश्यकता रहती है और वो तीन हैं दुकानदार,ग्राहक और सामान। यदि ये तीन चीजें न हों तो दुकान चल ही नहीं सकती । जब एक छोटी सी दुकान की ही ये स्थिति है तो भला इतनी बड़ी दुकान यह संसार बिना तीन चीजों के कैसे चल सकता है? इस संसार रूपी दुकान में भी दुकानदार तो है ईश्वर,ग्राहक हैं हम सब जीवात्माएं और सामान है यह प्रकृति, इस प्रकार बिना इन तीनों के संसार भी नहीं चल सकता। ऐसे अनेकों प्रमाण उपलब्ध होते हैं जिससे कि इन तीनों पदार्थ का अस्तित्व स्वीकार करना अनिवार्य हो जाता है ।जो कोई इन तीनों की सत्ता को पृथक-पृथक स्वीकार नहीं करते, जीवात्मा और ईश्वर की सत्ता को भिन्न नहीं मानते अथवा प्रकृति की सत्ता को भी असत रूप या मिथ्या रूप कहते हैं उनको इन शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर विशेष रूप से विवेचन करना चाहिए और वास्तवि

ALL COMMENTS (0)