भगवती साईं जागरण या मनोरंजन की दुकान

बसंत पंचमी का पावन पर्व था। पटना के मशहूर बी.एन. कालेज में एक तरफ जहां कुछ छात्र मां सरस्वती की पूजा करने में व्यस्त थे तो वहीं दूसरी तरफ कालेज हास्टल के कुछ छात्र रात भर अश्लील गानों पर डांस करते रहे। सरस्वती पूजा के नाम पर पूरी रात अश्लील गानों पर नंगा नाच हुआ अर्धनग्न युवतियां छात्रों के बीच स्टेज पर ठुमकती रही और कुछ छात्र अपने हाथ में ली हुई बंदूक से फायरिंग करते रहे। आपको बता दूँ कालेज  में हर साल इस तरह के आयोजन होते हैं जहां सरस्वती पूजा के नाम पर अपने मनोरंजन का साधन ढूंढ़ते हुए बार-बालाओं का नाच करवाया जाता है।

 

हिन्दी के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की सरस्वती वंदना पर एक प्रसिद्ध कविता है-‘‘वर दे वीणावादिनी! वर दे। प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव, भारत में भर दे। वर दे वीणावादिनी! वर दे।’’ सरस्वती वंदना के इस गीत की जगह यहाँ भोजपुरी, हिन्दी भाषा में अश्लील गीतों का बोलबाला रहा। हालाँकि धर्म के नाम पर मनोरंजन का यह पहला वाक्या नहीं है। हमारे देश में आज कल यह काम धड़ल्ले से जारी है। एक बड़ा वर्ग इसे धर्म का हिस्सा बताकर मन्त्रमुग्ध है उनकी माने से जागरण से ही धर्म रक्षा हो रही है। बाहर सांस्कृतिक कार्यक्रम लिखा जाता है अन्दर कुछ अलग ही संस्कृति चलती है।

 

चलो कुछ देर शेष भारत की बात छोड़ दी जाये और अकेली राजधानी दिल्ली की बात करें तो फ्लाई ओवर, के नीचे, चैराहों के इर्द-गिर्द लटके बोर्ड जिन पर लिखा होता है ‘‘सोलहवां माँ भगवती जागरण’’ मशहूर गायक फलाना, तो कहीं 21वां साईं जागरण, जिसमें स्थानीय नेताओं की फोटो भी चिपकी होती है। कहीं-कहीं तो सौवां विशाल भगवती जागरण लिखा भी दिखता है। मतलब अब जागरण के साथ विशाल शब्द लिखा जाने लगा। कभी कोई यह समझे कि छोटा-मोटा जागरण हो!

 

जागरण की इस मनोरंजन भरी रात पर शोध करें तो इसमें आपको धर्म, ईश्वर भक्ति के अतिरिक्त इसमें बाकी सब कुछ दिखाई देगा। रात्रि जागरण अमूमन स्कूलों, गलियों या मेन रास्तों के आस-पास होता हैं, एक बड़ी, साथ में कुछ छोटी मूर्तियाँ होती हैं। इसके बाद बड़े-बड़े स्पीकर और श्रृंगार से सजे-धजे गायक, गायिका आते हैं पूरी रात गीत-संगीत चलता है। तेज आवाज पर लोग नाचते हैं। जिस देवी-देवता के नाम से जागरण होता है शायद वह इन थिरकते गीतों से खुश हो जाता होगा? सुबह को, लाइट, टेंट, वाले से लेकर गायक आदि अपना-अपना मेहनताना लेकर चले जाते है। 

 

हालाँकि अब जागरण का छोटा रूप भी चल रहा है जिसे ‘माता की चैकी’ कहा जाता है। जागरण पूरी रात का होता है, चैकी यह दो घंटे की तारा रानी की कथा के साथ संपन्न हो जाती है। ये आप छह से नौ, नौ से बारह या बारह से तीन के टाइम में करा सकते हैं। बिल्कुल मूवी के शो की तरह। कनाडा से चलने वाली साइट देवी मंदिर डॉट कॉम पर जाइये दुर्गा सप्तशती में लिखा है कि अगर लोग साल में एक बार माता की चैकी लगायें तो उन्हें धन मिलेगा, काबिल बच्चे होंगे और बाधाएं दूर हो जाएंगी। यह बिल्कुल गृह क्लेस, सौतन, दुश्मन से छुटकारा, खोया प्यार, मनचाहा प्यार, पांच मिनट में जमीन विवाद सुलझाने वाले बंगाली बाबाओं की ही बड़ी फर्म है। जो अनपढ़ है उनके लिए रूहानी, बंगाली बाबा हैं और जो पढ़े लिखे है उनके लिए ये अंधविश्वास से भरी ये साईटे हैं।

 

जागरण मण्डली भी कई तरह की होती हंै किसी के पास सिर्फ गायक होते हैं, किसी के पास अच्छा तेज आवाज वाला डीजे साउंड सिस्टम, तो किसी के पास सारा जुगाड़ एक जगह ही मिल जाता है, वह बस पूछ लेते हंै नाचने वाले लड़के चाहिए या लड़कियां? किसके नाम से कराना है मसलन भगवती, साईं, सरस्वती या दुर्गा? यदि कोई साईं जागरण कराता है तो इसके बाद शिरडी वाले साईं बाबा की जयकार गूंजती रहेगी महाभिषेक के साथ ही फूल बंगला, छप्पन सत्तावन भोग सजाकर, जमकर जयकारे लगाए जाते हैं। अगले दिन अखबार के किसी छोटे से कोने में खबर होती है कि फला जगह जयघोषों की गूंज और भक्ति से सराबोर भक्तों के नृत्य से समूचा वातावरण साईंमय नजर आया। भजन-संगीत और देर शाम से रंगीन रोशनी में नहाए पंडाल में भक्त जमकर झूमे। फला जगह से पधारे गायक ने भक्तिगीतों से श्रद्धालुओं को सराबोर कर दिया।

 

अब शायद कुछ लोग मेरे विचारों से सहमत न हों, मुझसे रुष्ट हो जाएं, भला-बुरा कहें। हो सकता है कि वे ही सही हों। पर मैं तो अपने मन की ही कह सकता हूँ। जो देखता आया हूँ, जो देख रहा हूँ, वही कह सकता हूँ। जैसे-जैसे देश में धर्म के नाम पर अनुष्ठानों में बढ़ोतरी होती जा रही है वैसै-वैसे देश में धर्म की स्थिति कमजोर होती जा रही है। हालांकि भारत के अनेक कथित धर्म गुरु, सोशल मीडिया पर धर्म रक्षक, बड़ी ही बुलंद और ऊंची आवाज में इस बात को नकारने की कोशिश करते हैं और ऐसा करते हुए उनके चेहरे पर आई चमक और आत्मविश्वास से ऐसा लगता है कि बिना कुछ किए-धरे उनके सिंहनाद से हिन्दू धर्म पूरे ब्रह्मांड की धुरी बन जायेगा।

 

मुझे तो ऐसा लगता है कि ऐसे तेवर अपनी जिम्मेदारियों से भागने का सबसे आसान तरीका है। संकट को स्वीकार ही न करो। जब संकट है ही नहीं तो उससे निपटने के लिए कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं। जागरण के नाम पर अश्लील गीत गाओ, अनुष्ठान करो, हलवा-पूड़ी खाओ। अगर कोई इसका कारण जानना चाहे तो उसे आर्य समाजी, नास्तिक, फलाना ढिमका कहकर हडकाओं यह शब्द संवाद की रीत इनके शिष्य पूरे मनोयोग से पालन करते हैं। अब सवाल यह है यदि लोग भगवान को खुश करने के लिए यह सब करते है तो क्या भगवान भी दुखी रहते हैं?  यदि नहीं तो अपने स्वयं के मनोरंजन को धार्मिक मंच देकर अश्लील गानों पर थिरकना कहाँ तक उचित है? 

 

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