शरणार्थी वह होता है जो जरूरी कागजात लेकर किसी राष्ट्र से कुछ समय के लिए शरण मांगता है और घुसपैठिया उसे कहा जाता जो चोरी से किसी राष्ट्र की सीमा में प्रवेश कर जाये। शायद इसी अंतर को स्पष्ट करने के लिए असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) का दूसरा और आखिरी ड्राफ्ट पेश कर दिया गया है। इसके तहत 2 करोड़ 89 लाख 83 हजार 677 लोगों को वैध नागरिक मान लिया गया है। इस तरह से करीब 40 लाख लोग अवैध पाए गए हैं, जो अपनी नागरिकता के वैध दस्तावेज को साबित नहीं कर सके हैं। हालाँकि ;एनआरसीद्ध को लेकर अभी काफी असमंजस की स्थिति है लेकिन इस असमंजस को वही समझ सकता है, जिसने बड़ी मेहनत से घर बनाया हो और घुसपैठिये द्वारा की गई साम्प्रदायिक हिंसा की अग्नि की लपटों में स्वाह कर बैठा हो।

भारत का बांग्लादेश से जुड़ा असम का दक्षिणी भाग नागरिकता की इसी असमंजस की लहरों में तैर रहा है। भले ही लोग इस भाग से मानचित्रों, किताब के कुछ पन्नों और अखबार की सुर्खियों से परिचित हो गये हों किन्तु यह परिचय भी केवल असम राज्य का नाम और उसकी राजधानी छोड़कर यादों के कोने में बहुत देर नहीं टिकता। लेकिन भारतीय होने के नाते राज्य से हम सबका एक जुड़ाव है, जो हमारी राष्ट्रीय पहचान के साथ-साथ चलता रहता है। अगर व्यावहारिकता के धरातल पर आकर सोचें तो यह साफ दिखता है कि एनआरसी का यह तरीका सही है। बाहरी घुसपैठिया, मूल नागरिकों के संसाधनों से लेकर अधिकारों तक में सेंध लगाते हैं। इस बदलाव से सबसे अधिक परेशान मूल नागरिकों में गरीब और सबसे निचला तबका होता है जो दैनिक, मजदूरी पर अपनी जिंदगी गुजारता है। इसके मन में प्रवासियों को लेकर नफरत पनपने लगती है। तब स्थानीय निवासी यह अपेक्षा रखता है कि लोकतान्त्रिक तरीकों से राजनेता परेशानियों का समाधान करे। 

इसी समाधान का हल तलाशने के लिए पिछले तीन सालों से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नया राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ;एनसीआरद्ध बनाने की तैयारी चल रही थी। इससे पहले वाला नागरिक रजिस्टर सन् 1951 में बना था। इस प्रक्रिया के सहारे ही असम के मूल नागरिकों की पहचान की जानी है। बस यही मूल समस्या है असम हर जगह जैसी जगह नहीं है कि इसे सहन कर लिया जाए। यह दो देशों के बीच मौजूद भूमि पर अपनी जिंदगी जीता है। इसलिए घुसपैठियों को लेकर असम की राजनीति आजादी के बाद से ही उफनती रही है।

दूसरा असम में घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए यह अभियान करीब 37 सालों से चल रहा है। सन् 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वहां से पलायन कर लोग भारत भाग आए और यहीं बस गए। इस कारण स्थानीय लोगों और घुसपैठियों में कई बार हिंसक वारदातें हुईं। अस्सी के दशक से ही यहां घुसपैठियों को वापस भेजने के आंदोलन हो रहे हैं। सबसे पहले घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन 1979 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद ने शुरू किया। यह आंदोलन हिंसक हुआ और करीब 6 साल तक चला। हिंसा में हजारों लोगों की मौत हुई। हिंसा को रोकने में 1985 में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ। उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद के नेताओं में मुलाकात हुई। तय हुआ कि 1951-71 से बीच आए लोगों को नागरिकता दी जाएगी और 1971 के बाद आए लोगों को वापस भेजा जाएगा। आखिरकार सरकार और आंदोलनकारियों में बात नहीं बनी और समझौता फेल हो गया।

इसी कारण असम में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ता चला गया। इसके बाद 2005 में राज्य और केंद्र सरकार में (एनआरसी) लिस्ट अपडेट करने के लिए समझौता किया। धीमी रफ्तार की वजह से मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस मुद्दे पर कांग्रेस जहां सुस्त दिखी। वहीं, बीजेपी ने इस पर दांव खेल दिया और 2014 में भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया। मोदी ने चुनावी प्रचार में बांग्लादेशियों को वापस भेजने की बातें कहीं। इसके बाद 2015 में कोर्ट ने एनआरसी लिस्ट अपडेट करने का भी आदेश दे दिया जब 2016 में राज्य में भाजपा की पहली सरकार बनी और अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों को वापस भेजने की प्रक्रिया फिर तेज हो गई।

असम में 1971 के पहले या बाद कितने बांग्लादेशी आए हैं, इसका हिसाब किसी के पास नहीं है। लेकिन हर कोई कह रहा है कि बांग्लादेशी जरूर आए होंगे क्योंकि इस दौरान राज्य में मुसलमानों की आबादी में इजाफा हुआ है। सन् 1971 में असम में मुस्लिम आबादी 24.56 प्रतिशत थी, जो 2001 में बढ़कर 30.92 प्रतिशत हो गई। इसी तरह राज्य के मुस्लिम बहुल जिलों में मुसलमानों के बढ़ते अनुपात पर चिंता व्यक्त की जाती है। धुबड़ी जिला बांग्लादेश से सटा हुआ है और वहां नदी के रास्ते बांग्लादेश आना-जाना बिल्कुल आसान है। वहां की मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 1971 के 64.46 से बढ़कर 2001 में 74.29 हो गया। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि इन 30 सालों में असम में यदि मुसलमानों की संख्या 129.5 फीसदी बढ़ी है बस असम के संगठन इसी जनसंख्या वृद्धि को अवैध घुसपैठ का अकाट्य प्रमाण मानते हैं।

नागरिकता अधिनियम-1955 में संशोधन का प्रस्ताव है। इस संशोधन के एक प्रावधान का संदेश यह है कि भविष्य में हिन्दू, बौद्ध और जैन समुदाय से जुड़े लोगों को छोड़कर भारत के पड़ोसी देश से जुड़े किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल नहीं होगी। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि मुस्लिम बहुलता वाले पड़ोसी देश के व्यक्ति भारत की नागरिकता के अधिकारी हो ही नहीं सकते। पहले चरण में एनसीआर की सूची में शामिल होने से रह गए लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह नागरिकता संशोधन बिल ही है। इस सूची में शामिल होने से असफल रहे लोग इस रजिस्टर को ड्राफ्ट मानकर भूलने की कोशिश भी करें तो भी नागरिकता अधिनियम में प्रस्तावित बदलाव की बात उन्हें चैन से सोने नहीं देगी। भीतर ही भीतर दक्षिणी असम के मूलनिवासी, भाषाई और धार्मिक ताने-बाने में टूटने की सारी परिस्थितियां बन गई हैं। अब देखना यह होगा कि राजनीति इसे संभाल पाती है या विपक्षी नेताओं के गृहयुद्ध  जैसे बयानों से किसी बड़ी सुनामी को पैदा करती है।

-राजीव चौधरी

 

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