आर्यसमाज की विचारधारा के अनुरूप शिक्षा के विस्तार के लिये स्थापित यह गुरुकुल विश्वविद्यालय वृन्दावन, मथुरा उत्तर प्रदेश राज्य के प्रमुख हिन्दू तीर्थ नगरी वृन्दावन के गौरानगर नामक स्थान पर स्थित है। इस गुरुकुल की स्थापना सन् 1900 ईसवी में हुई थी। पहली पीढ़ी के प्रमुख आर्यसमाजों के विद्वानों में अग्रणीय स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी इस गुरुकुल के संस्थापक हैं। आचार्य विश्वेश्वर जी गुरुकुल के संस्थापक आचार्य थे। पूर्व प्रसिद्ध आचार्य वेदव्रत जी, आचार्य बृहस्पति जी, आचार्य शंकरदेव जी, आचार्य विश्वश्रवा जी आदि रहे हैं। आचार्य बृहस्पति जी सेवानिवृत्त होकर देहरादून में निवास करते रहे। यहीं उनका अपना निवास था।

हमने उनके आर्यसमाज में दर्शन किये थे। आर्यसमाज में उनके प्रवचनों को सुना था। जब हम स्नातक कक्षा के विद्यार्थी थे, तब एक दिन आचार्य बृहस्पति जी ने हमारे महाविद्यालय में धर्म एवं संस्कृति विषय पर एक व्याख्यान भी दिया था। उन दिनों हम आर्यसमाज के विषय में कुछ अधिक नहीं जानते थे। हमारे एक मित्र श्री अनूप मेहरा जी हमारी युवावस्था के दिनों में आचार्य जी के निवास पर महीने में एक दो बार आते जाते थे और उनके विद्युत व जल आदि बिलों को जमा कराने सहित उनके कुछ अन्य कार्य भी कर आते थे। मृत्यु से पूर्व आचार्य जी के पैर की हड्डी टूट गई थी।

 आप देहरादून के टैगोर विला के एक नर्सिगं होम में रहे। वहां हमारे एक आर्य समाजी मित्र श्री वेदप्रकाश जी ने उनकी तन व मन से सेवा की थी। हमें अपने मित्रों से जो जानकारी मिली है उसके अनुसार वृद्धावस्था में उनके परिवारजनों ने उनकी वैसी सेवा नहीं की, जिसकी अपेक्षा की जाती है। यह बातें हमें हमारे टैगोर विला के निवासी मित्र श्री वेदप्रकाश जी ने विस्तार से बताई थी। आचार्य जी ने देहरादून की एक लगभग अनपढ़ महिला ब्रह्मवती नारंग को अल्पायु में विधवा हो जाने पर अपनी पुत्री बनाकर पढ़ाया था।

इन्होंने संस्कृत में स्नातोकत्तर उपाधि प्राप्त की थी। यह देहरादून की पुरानी आर्य संस्था महादेवी कन्या स्नात्कोत्तर महाविद्यालय, देहरादून में संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष रही हैं। हमने श्रीमती नारंग जी के अनेक प्रवचनों को भी सुना है। श्री वेदप्रकाश जी ने हमें उत्तर प्रदेश के प्रख्यात मुख्यमंत्री डॉ० सम्पूर्णानन्द जी का आचार्य बृहस्पति जी से जुड़ा प्रसंग भी सुनाया था। डॉ० सम्पूर्णानन्द जी आचार्य जी को गुरु का सम्मान देते थे और उनके सभी कामों को करने के लिये सदैव तत्पर रहे व किये। एक बार सम्पूर्णानन्द जी ने आचार्य जी को लखनऊ में सचिवालस में देखा तो उन्होंने उनके चरण स्पर्श कर सत्कार किया और अपने कर्मचारियों को आचार्य जी को अपने स्थान पर विश्राम करने के लिये भिजवा दिया। साय अपने कार्यों से निव्त होकर वह आचार्य जी के पास आये और योग्य सेवा पूछी। आचार्य जी ने जो कहा, उसे डॉ० सम्पूर्णानन्द जी ने पूरा कराया।

गुरुकुल वृन्दावन अपनी शिक्षा योजना के अनुसार गतिशील है। यह किसी संस्था से संलग्न न होकर स्वायत्तशासी संस्था रहा है। पहले इस विश्वविद्यालय की सभी परीक्षायें व उपाधियां मान्य थी परन्तु अब नहीं हैं। गुरुकुल में कक्षा 6 से कक्षा 12 व उसके बाद शास्त्री व आचार्य परीक्षाओं का अध्ययन कराया जाता है। इन सभी कक्षाओं में यहां छात्र अध्ययन कर रहे हैं। गुरुकुल में विद्यार्थियों की संख्या निम्नवत् है।

कक्षा 6 -10

कक्षा 7 -10

कक्षा 8 -12

कक्षा 9 -10

कक्षा 10 -8

कक्षा 11 -13

कक्षा 12 -10

शास्त्री परीक्षा -8

आचार्य परीक्षा -7

गुरुकुल वृन्दावन 50 एकड़ भूमि में विस्तृत है। यह सम्पत्ति गुरुकुल के नाम पर सरकारी अभिलेखों में पंजीकृत है। गुरुकुल में 10 बड़े हाल, छात्रावास, अध्यापन के लिये कमरे, गोशाला भवन, पाकशाला भवन, पुस्तकालय, यज्ञशाला, आचार्य कक्ष-4 अतिथि कक्ष-4 उपलब्ध हैं। गुरुकुल का भवन देखकर प्राचीन काल के गुरुकुलों की याद स्मरण हो आती है। हमें कुछ वर्ष पूर्व यहां जाने का अवसर मिला था। तब श्री कैलाशनाथ सिंह आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के प्रधान थे। हमने देखा था कि परिसर में भव्य इमारतें बनी हुई हैं। बहुत अच्छा लगा था इन्हें देखकर। यह सभी भवन बहुत पुराने हो चुके हैं। गुरुकुल की आर्थिक स्थिति पर विचार करें तो हमें लगता है कि इनकी मरम्मत व रखरखाव कराना आसान नहीं है।

बच्चों की संख्या भी गुरुकुल के अतीत व उपलब्ध क्षमता की दृष्टि से कम है। हमें लगता है कि कोई भी संस्था सुयोग्य हाथों में रहे तो फलती फूलती है। गुरुकुल का अतीत स्वर्णिम है। यहां आर्यसमाज के महान् विद्वान एवं नेता महात्मा नारायण स्वामी जी ने अपनी सेवायें दी थी। उनके समय में यह गुरुकुल उत्कर्ष के चरम पर था। हमें लगता है कि आर्यसमाज के संगठन में फूट न होती तो यह गुरुकुल अन्य अनेक गुरुकुलों व शिक्षण संस्थाओं की तरह उत्कर्ष पर होता। ईश्वर करे कि यह गुरुकुल पुनः अपने पुराने वैभव व प्रसिद्धि को प्राप्त हो।

गुरुकुल वृन्दावन ने आर्यसमाज व देश को 200 से अधिक वेदाचार्य दिये हैं। यहां के स्नातकों में से कुछ विद्वान सांसद व विधायक भी बने हैं। आचार्य मेधाव्रत जी संस्कृति के महाकवि हुए हैं। आचार्य विश्वेश्वर जी प्रसिद्ध साहित्यकार हुए हैं। गुरुकुल ने आर्यसमाज को अनेक प्रचारक भी दिये हैं। गुरुकुल के अनेक स्नातक आर्यजगत के प्रसिद्ध ग्रन्थकार व लेखक भी रहे हैं। यह गुरुकुल पराधीनता के वर्षों में क्रान्तिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र स्थान रहा है। गांधी जी, श्री जवाहरलाल नेहरू, श्री लाल बहादुर शास्त्री, जननेत्री सरोजनी नायडू आदि प्रसिद्ध लोगों ने गुरुकुल के द्वारा किये गये कार्यों की प्रशंसा की है।

गुरुकुल की आवश्यकताओं में गुरुकुल की बाउण्डी वाल का निर्माण कराना है। ऐसा न होने पर गुरुकुल भूमि में असामाजिक तत्वों के कब्जे होने की सम्भावना है। शायद कुछ लोगों ने कर भी लिये हों। गुरुकुल के अधिकारियों की मांग है कि गुरुकुल की आयुर्वेद शिरामणि व पूर्व की अन्य सभी उपाधियों की मान्यता को बहाल किया जाये। गुरुकुल के अधिकारी यह भी अनुभव करते हैं कि भारत के सभी गुरुकुलों का एक शिक्षा बोर्ड बनाया जाये। अपने मित्रों एवं समाचार पत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह कार्य प्रगति पर है और हमें आशा है कि शीघ्र ही वैदिक शिक्षा बोर्ड का निर्माण साकार हो जायेगा।

गुरुकुल के वर्तमान अधिकारियों में प्राचार्य पद पर श्री हरिशरण जी हैं। प्रधान श्री भगत सिंह वर्मा, पूर्व आईएएस हैं। मंत्री श्री प्रेम सिंह जादौन (मोबाइल न0 9897891577) तथा श्री वी0सी0 गुप्त कोषाध्यक्ष हैं। यह भी बता दें कि वृन्दावन के राजा महेन्द्र प्रताप ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के भक्त व अनुयायी थे। उन्हीं ने अपनी भूमि व धन दान देकर इस गुरुकुल को स्थापित कराया था। यह गुरुकुल एक प्रकार से राजा महेन्द्र प्रताप जी का स्मारक भी है। इसकी उन्नति हो, यह उत्कर्ष पर पहुंचे, यह हमारी ईश्वर से प्रार्थना है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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