ऋषि दयानन्द वेदों के संस्कृत एवं हिन्दी भाषा के भाष्यकार हैं। उन्होंने ऋग्वेद आंशिक एवं यजुर्वेद का सम्पूर्ण भाष्य संस्कृत एवं हिन्दी भाषा में किया। उनका ग्रन्थ ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ स्वयं में वैदिक साहित्य की एक अनुपम कृति है। इस ग्रन्थ को पढ़कर ही वेदों के महत्व से परिचित हुआ जा सकता है। ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य को समझने के लिये भूमिका ग्रन्थ का अध्ययन आवश्यक है। ऋषि दयानन्द की वेदभाष्य शैली भी अत्युत्तम है। वेदभाष्य में वह पहले मन्त्र के पाठो का पदच्छेद करते हैं। इसके बाद अन्वय देते हैं। अन्वय के बाद अन्वय के अनुसार संस्कृत भाषा में पदार्थ एवं उसके बाद हिन्दी भाषा में पदार्थ और अन्त में संस्कृत एवं हिन्दी में भावानुवाद देते हैं। ऋषि दयानन्द का वेदभाष्य उनसे पूर्व के उपलब्ध सभी वेदभाष्यों में सर्वोत्तम है। ऋषि दयानन्द के किये हुए अर्थ व्यवहारिक एवं पारमार्थिक हैं जिससे हमें अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति में सहायता एवं मार्गदर्शन मिलता है। इसकी परीक्षा पाठक स्वयं पढ़कर, विचार कर व अन्य भाष्यों को देखकर कर सकते हैं।

आर्यसमाज में ऋषि दयानन्द जी के बाद अनेक वेदभाष्यकार हुए हैं जिन्होंने न केवल ऋषि दयानन्द जी के अवशिष्ट भाष्य के कार्य को पूरा करने का प्रयत्न किया अपितु उस भाग का भी भाष्य किया जिस पर ऋषि दयानन्द का भाष्य उपलब्ध है। हम जानते हैं कि देश में अधिकांश लोग हिन्दी बोलते, समझते व पढ़ते हैं। हमारे देश में अनेक क्षेत्रीय भाषायें हैं जहां आज भी हिन्दी पढ़ने की क्षमता लोगों में नहीं है। ऐसे लोगों को उनकी भाषा में ही वेदभाष्य सहित वैदिक साहित्य के ग्रन्थों को उपलब्ध कराना आर्यसमाज का कर्तव्य है। इसी की पूर्ति तमिल भाषा के विद्वान ऋषि भक्त श्री एम. आर. जन्बुनाथन जी ने की है। डॉ0 भवानीलाल भारतीय जी ने इनका अति संक्षिप्त परिचय अपनी पुस्तक ‘वेदो के वेद सेवक विद्वान’ में दिया है। हम वहीं से श्री जम्बुनाथन जी का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं।

तमिलभाषा में वैदिक साहित्य के प्रणेता एम.आर. जम्बुनाथन का जन्म 23 अगस्त सन् 1896 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के मनक्कल ग्राम में हुआ। इनका पूरा नाम मनक्कल रामस्वामी जम्बुनाथन था। तमिल, संस्कृत तथा अंग्रेजी में आपका उच्चस्तरीय अध्ययन हुआ। ऋषि दयानन्द की विचारधारा से परिचय प्राप्त कर आपने वैदिक धर्म को अंगीकार किया ओर अपनी मातृभाषा तमिल में वैदिक साहित्य का प्रणयन किया। 18 दिसंम्बर 1978 को आपका निधन हुआ। श्री जम्बुनाथन ने चारों वेदों का तमिल भाषा में अनुवाद किया है जिसका विवरण इस प्रकार है--ऋग्वेद (1978), यजुर्वेद-शुक्ल एवं कृष्ण (1938), सामवेद (1934), अथर्ववेद (1940), शतपथ ब्राह्मण की कथायें (1933), उपनिषद् कथाएं (1932), कठोपनिषद् (तमिल) 1932 में। तमिल जैसी प्राचीन तथा प्रांजल भाषा में वेदों का आपका किया अनुवाद एक महत्वपूर्ण कार्य है।

इण्टरनैट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्री एम.आर. जम्बुनाथन जी ने सत्यार्थप्रकाश के अनुवाद सहित स्वामी दयानन्द जी और स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन एवं कार्यों पर भी ग्रन्थों की रचना की है। योग एवं योगासनों पर भी आपने अनेक पुस्तकें लिखी हैं। हम आशा करते हैं कि पाठकों के लिये यह संक्षिप्त परिचय किंचित लाभप्रद होगा। ईश्वर भक्त, ऋषि भक्त, आर्यसमाज के पोषक एवं वेद सेवक विद्वान श्री एम.आर. जम्बुनाथन जी को सादर नमन एवं श्रद्धांजलि। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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