थोड़े समय पहले भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने करतारपुर कॉरिडोर बनाने का ऐलान किया था। इस ऐलान से दुनियाभर में फैले करोड़ों सिख भाईयों के चेहरे भी खिल उठे थे। लेकिन अब पाकिस्तान से जो खबर आई है उससे एक बार फिर पाकिस्तान ने अपनी मजहबी मानसिकता दिखा दी है। खबर है कि लाहौर से करीब 100 किलोमीटर दूर नारोवाल शहर के बाथनवाला गांव में सदियों पुराने गुरु नानक महल को तोड़ दिया है। इसकी कीमती खिड़कियां, दरवाजे और रोशनदान तक बेच दिए हैं।

पाकिस्तानी अखबार डॉन की ख़बर के अनुसार इस चार मंजिला इमारत की दीवारों पर सिख धर्म के नींव रखने वाले बाबा नानक और कई हिंदू राजाओं और राजकुमारों की तस्वीरें थीं। इस इमारत में 16 बड़े कमरे थे, जिनमें हर किसी में तीन खूबसूरत दरवाजे और चार वेंटिलेटर थे। “इस पुरानी इमारत को बाबा गुरु नानक जी का महल कहा जाता है भारत सहित दुनिया भर के कई सिख इस इमारत में आते थे” लोगों का आरोप है कि धार्मिक मामलों के विभाग के अफसर भी इसमें शामिल हैं जिन्हें मीडिया द्वारा शरारती तत्व कहा जा रहा है।

असल में पाकिस्तान अल्पसंख्यक समुदाय सिख और हिन्दू भारत में बसे मुसलमानों जितने ख़ुशनसीब नहीं हैं कि इधर कुछ लोगों द्वारा बाबरी का ढांचा गिराया और उधर पूरे विश्व को हिला देने वाली चींखे सुनाई देने लगी। जबकि मस्जिद विवादित थी और उक्त स्थान से करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था भी जुडी थी। कमाल देखिये छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद पाकिस्तान में इसकी प्रतिक्रिया होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा था। बाबरी मस्जिद के बाद पाकिस्तान में तकरीबन 100 मंदिर या तो जमींदोज कर दिए गए या फिर उन्हें भारी नुकसान पहुँचाया गया था। इनमें से कुछ मंदिरों में 1947 में हुए बंटवारे के बाद पाकिस्तान आए लोगों ने शरण ले रखी थी। जैन मंदिर से लेकर उन्मादियों ने सभी गैर इस्लामिक धर्म स्थलों को ढहा दिया था। जहां अब केवल इसके धूल फांकते खंडहर बाकी रह गए हैं। यही नहीं लाहौर में एयर-इंडिया के दफ्तर पर हमला हुआ था और भारत विरोधी नारे लगाए गए थे। इसके बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भारतीय उच्चायुक्त को तलब किया था और बाबरी मस्जिद विध्वंस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए मस्जिद का पुनर्निर्माण जल्द करने की मांग की थी।

आज विडम्बना देखिये कि बाबरी पर शोर मचाने वाले पूरे विश्व भर के मुसलमान और वामपंथी पत्रकार मौन साधकर बैठ गये हैं। इसके उलट यदि भारत में किसी एक सडक पर किसी मजार को किसी भी कारण जरा सी क्षति हो जाये तो यह लोग आसमान को सिर पर उठा लेते है। जबकि एक तरफ ये भी कहते है कि इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है।

कहा जाता है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने जब पाकिस्तान बनाया था, तो कहा था कि पाकिस्तान में रहने वाले लोग अपनी अपनी इबादतगाहों, मस्जिदों या मंदिरों में जाने के लिए आजाद हैं। किसी का मजहब क्या है, इसका हुकूमत से कोई ताल्लुक नहीं है।

लेकिन जिन्ना के सामने से ही जिन्ना के इन दावों का दम निकल चुका था। क्योंकि पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों का क्या हाल है पूरी दुनिया इससे वाकिफ है। लेकिन सिद्दू समेत भारत में रहने वाले अनेक बुद्धिजीवी दिन रात पाकिस्तान की तारीफ के कसीदे पढ़ते रहते हैं। आज बहुत सारे लोगों को ये पाकिस्तान से आई एक छोटी सी ख़बर लग रही होगी। लेकिन हमें लगता है कि इस ख़बर को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। क्योंकि 1947 में जब पाकिस्तान बना था, उस वक्त वहां 23 फीसदी गैर-मुस्लिम थे। लेकिन अब वहां पर सिर्फ 3 से 4 फीसदी अल्पसंख्यक ही बचे हैं। गजब देखिये किसी देश की आबादी का 20 फीसदी हिस्सा अगर गायब हो जाए. और कोई आवाज तक न उठे तो ये सवाल तो बनता है कि पाकिस्तान के करीब 20 फीसदी  गैर मुस्लिम कहां चले गए? इसका जवाब ये है कि गैर मुस्लिमों का या तो जोर-जबरदस्ती से धर्म बदल दिया गया. या फिर उन्हें मार डाला गया।

आजादी के बाद 1951 में पाकिस्तान में करीब 15 फीसदी हिंदू समुदाय के लोग रहते थे। यानी उस वक्त पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या करीब 50 लाख थी। पाकिस्तान में 1998 के बाद अब जाकर जनगणना हो रही है। और उसमें अभी ये पता नहीं चल पाया है कि अब पाकिस्तान में कितने हिंदू और सिख बचे हैं। ये सब वो है जिनके लिए न कोई संयुक्त राष्ट्र में जाता। जिनके लिए न कोई साहित्यकार, कोई लेखक या कोई फिल्मकार अपना अवॉर्ड वापस करता। इसी कारण देखते-देखते कराची में पारसियों, यहूदियों के धर्म स्थल बंद कर दिए गए। बहुत से जैन और हिंदू मंदिरों को या तो तोड़ दिया गया या फिर उन पर भूमाफियाओं ने कब्जे कर लिए गये। पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों पर धर्म के आधार पर हिंसा होना कोई नई बात नहीं है। बताया जाता है कि 2012 से 2013 के बीच में ही पाकिस्तान में सांप्रदायिक हमलों की कम से कम 200 घटनाएं हुई थीं, जिनमें 700 से ज्यादा लोग मारे गए थे। और आज भी वहां ऐसे अत्याचार लगातार हो रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान प्रेम में डूबे बुद्धिजीवी चुप है। मौन है। इन्हें सिर्फ भारत में असहिष्णुता नजर आती है। इस कारण इसे ढोंग न कहकर इनका सीधा एजेंडा कहना चाहिए जो पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को बदनाम करने के लिए चलाया जा रहा है।

 

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