नई शिक्षा नीति में कितनी नीति कितनी है और राजनीति कितनी यह तो समय आने पर पता चलेगा। किन्तु इस नीति से हिंदी भाषा की जो दुर्दशा होने वाली है उसका हाल अभी दिख रहा है। केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति के प्रारूप में त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर उठे विवाद के बीच सोमवार को नई शिक्षा नीति का संशोधित प्रारूप जारी कर दिया है। नई शिक्षा नीति के तहत गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी अनिवार्य किए जाने का उल्लेख नहीं है। यानि अब जो राज्य या स्कूल अगर हिंदी भाषा को अपने यहाँ लागू नहीं करता उस पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं होगा।

इससे पहले के प्रारूप में समिति ने गैर हिंदी प्रदेशों में हिंदी की शिक्षा को अनिवार्य बनाने का सुझाव दिया था। जिसका तमिलनाडु में द्रमुक और अन्य दलों ने नई शिक्षा नीति के प्रारूप में त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध किया था और आरोप लगाया था कि यह हिंदी भाषा थोपने जैसा है। असल में केंद्र सरकार एक त्रिभाषा सूत्र लेकर आगे बढ़ रही थी जिसमें प्रांतीय भाषा, राजभाषा हिंदी और अंग्रेजी शामिल थी। जवाहरलाल नेहरु के जमाने में बने इस सूत्र को तमिल पार्टियों ने तब भी रद्द कर दिया था और 1965 में लालबहादुर शास्त्री के जमाने में हिंदी के विरोध में इतना बड़ा तमिल आंदोलन हुआ था कि उसमें दर्जनों लोग मारे गए और सरकार ने त्रिभाषा सूत्र को बस्ते में डाल दिया था।

इस बार भी ऐसा प्रतीत हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी की मजबूत बहुमत वाली और राष्ट्र हित के नाम पर चुनाव जीतने वाली सरकार ने घुटने टेक दिए हो। क्योंकि यदि ये विरोध दक्षिण भारत के प्रबुद्ध लोग, विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, या युवावर्ग की ओर से होता तो समझ में आता। ये विरोध सिर्फ तमिलनाडु के राजनितिक दल कर रहे है जो समझ से परे है। जैसे पिछले सत्तर साल से हिंदी भाषा पर आघात पहुंचाया गया है एक बार वैसा ही पून: देखने को मिल रहा है। न इस मुद्दे पर उत्तर भारत का कोई राजनितिक दल अपना मुंह खोल रहा है और न ही इस पर संघ के संचालकों की भी कोई भूमिका सामने आई सकी है, बल्कि उनकी ओर से भी मौन स्वीकृति कही जा रही है।

देखा जाये तो भारत धर्मप्राण देश है हमारे धर्म, संस्कृति व प्राचीन साहित्य का माध्यम संस्कृत तथा हिंदी भाषा है। किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व, उसकी संस्कृति, उसकी सभ्यता उसका धर्म यह सब उस राष्ट्र की मात्रभाषा से जुड़े होते है, यदि मात्रभाषा का ही वध कर दिया जाये तो यह सब चीजें कितने दिन जीवित रहेगी स्वयं विचार कीजिए?  हमने 70 वर्ष पहले बलिदान देकर राजनैतिक स्वतन्त्रता पाई थी लेकिन ये 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारी हिंदी भाषा स्वतन्त्र नहीं हो पाई हैं। चुनाव से समय राजनेता मंचो से हिंदी में भाषण देते है, हिंदी भाषा के माध्यम से वोट बटोरते है जब सत्ता की देहरी पर पहुँच जाते है तब अचानक इस भाषा से मुंह मोड़ लेते है।

यदि आज भाषा के प्रश्न पर आप गंभीरता से विचार करें तो पूरे भारत में त्रिभाषा सूत्र बिलकुल एक पाखंड की तरह दिखाई देगा। आखिर क्यों त्रिभाषा सूत्र में अंग्रेजी को ढोया जा रहा है जबकि राष्ट्र की एकता अखंडता के लिए त्रिभाषा की जगह द्विभाषा सूत्र लागू किया जाना चाहिए था। यानि अपनी प्रांतीय भाषा सीखो और हिंदी भारत-भाषा सीखो इसके बाद जो राज्य सरकार या स्कूल अंग्रेजी रखना चाहे रख सकता है इसकी उसे स्वतंत्रता प्रदान कर देनी चाहिए।

असल में यह रोग उसी समय हमारे तत्कालीन नेताओं ने पैदा कर दिया था जब उन्होंने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग को स्वीकार किया था। भले ही यह उस समय की राजनितिक अदूरदर्शिता रही हो। लेकिन राज्यों के गठन में जैसे सभी राज्यों ने रूपये को राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में स्वीकार किया था उसी तरह उस समय ऐसी संवैधानिक व्यवस्था बना देनी थी कि केन्द्र सरकार की राजभाषा को सभी राज्यों की राजभाषा मानी जाए। किन्तु ऐसा नहीं हो सका और भाषावार राज्यों की मांग को स्वीकार किया गया जिसका दंश आज हिंदी भाषा सबसे ज्यादा झेल रही है।

देखा जाये तो आज देश में हिंदी समझने और बोलने वालों की संख्या लगभग 70 करोड़ के आस-पास है। देश से बाहर भी लाखों लोग इसे जानते-समझते हैं, प्रयोग करने वालों की संख्या के लिहाज से यह चीन की भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। लेकिन इसके बावजूद भी हिंदी को कमजोर अनपढ़ गरीब लोगों की भाषा बना दिया गया। क्या 70 करोड़ लोग कम होते है एक भाषा को समझने बोलने के हिसाब से कि वह अपने देश की राजभाषा भी न बन सके? शायद इतनी जनसँख्या समूचे यूरोपीय देशों की है। वर्तमान में संख्याबल के अनुसार भी हिंदी उन सभी भाषाओँ में सबसे शीर्ष स्थान पर है जो भारत में प्रचलित है, इसलिए भारतीय के परिचायक के रूप में हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाया जाए। हाँ अन्य भारतीय भाषाओँ को भी हिंदी के साथ तालमेल स्थापित करने की दिशा अनुवाद आदि माध्यम से जोड़ने का प्रबंध किया जाएँ। यदि स्वतन्त्रता के 70 वर्ष बाद भी यदि हिंदी का स्थान एक ऐसी विदेशी अंग्रेजी भाषा के साथ साझा करना पड़े जिसे भारत में बोलने समझने वाले कुल 5 प्रतिशत लोग भी नहीं तो यह हिंदी का दुर्भाग्य है। इसके अलावा यदि 5 प्रतिशत तमिल भाषी राजनेताओं के सामने राजभाषा को लेकर केंद्र की मजबूत सरकार को घुटने टेकने पड़े तो यह सरकारी कमजोरी है हिंदी की नहीं।

 

 

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