कैराना के बाद अब इसी उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर का प्रहलादनगर भी अखबारों की सुर्खियों में है। वजह यहां से भी बड़ी तादाद में हिंदू परिवारों के पलायन का मुद्दा जोर पकड़ता जा रहा है। सन 1947 में देश की आजादी के दौरान बंटवारे के बाद मेरठ की प्रहलादनगर कॉलोनी शरणार्थी कॉलोनी के रूप में बसाई गई थी। लेकिन आज 70 साल बाद एक बार फिर लोगों को यहां से जाने के हालात पैदा हो रहे हैं। यहाँ से भी पलायन करने का वही है जो पाकिस्तान बांग्लादेश और कश्मीर में रहा था। आए दिन मोहल्ले की महिलाओं, बेटियों से छेड़खानी की घटनाएं आम बात होना, गलियों में मुस्लिम समुदाय के लड़के बेखौफ आए दिन बाइकों पर गलियों मे चक्कर लगाते हैं और परेशान करते हैं। मेरठ के इस मुहल्लेवासियों का आरोप है, युवतियों पर फब्तियां कसना और मारपीट करना इन युवकों का शगल बन चुका है। इन सभी बातों और वारदातों से परेशान होकर इन्होने अपना यहां का घर बेच दिया और परिवार सहित मेरठ के किसी दूसरे मुहल्ले में जाकर बस गए। यह सिर्फ प्रह्लाद नगर में ही नहीं बल्कि इस मोहल्ले से सटी दूसरी कालोनियां जैसे कि स्टेट बैंक कॉलोनी, राम नगर, हरिनगर, इश्वरपुरी, विकासपुरी जैसे दर्जनों मोहल्ले ऐसे हैं जो एक खास समुदाय के लोगों के कब्जे आ चुके हैं और हिंदू परिवारों का पलायन हो चुका है।

कुछ समय पहले दिल्ली के सराय रोहिल्ला में स्थित तुलसीनगर और दिल्ली के नॉर्थ ईस्ट क्षेत्र में स्थित ब्रह्मपुरी इलाके से लोगों के पलायन की खबरें आई थीं। यहां भी लोगों ने अपने घरों के बाहर यह मकान बिकाऊ है लिखना शुरू कर दिया था। यही नहीं इस समय देश में कम से कम 17 राज्य है, जहां से हिंदुओं को अपनी जन्मभूमि वाले स्थानों को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह एक किस्म से जमीन जिहाद है यानि हिन्दुओं के मोहल्लों में ऐसी हरकते की जाये ताकि वह अपनी जमीन ओने पौने दामों में बेचकर दूसरी जगह चले जाएँ! जम्मू कश्मीर, हरियाणा का मेवात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के कई इलाके, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के अनेकों जिलों में हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर करने के अलावा उनकी लड़कियों को अपमानित किया जा रहा है, उनकी जमीन जबरन कब्जाई जा रही है, मंदिरों पर हमले हो रहे हैं, उन्हें अपने त्योहारों को नहीं मनाने दिया जाता है।

एक समय कश्मीरी पंडितों को रातों रात अपने घरों को छोड़कर भागना पड़ा था। पाकिस्तान से जिया-उल-हक की तानाशाही से लेकर तालिबान के अत्याचारों तक पाकिस्तानी हिन्दुओं का जीवन दूभर ही रहा है। आजादी के वक्त पाकिस्तान में कुल 428 मंदिर थे, जिनमें से अब सिर्फ 26 ही बचे हैं। मानवाधिकार आयोग की वर्ष 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में हर महीने 20 से 25 हिन्दू लड़कियों का अपहरण होता है और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराया जाता है। इसी तरह अब भारत में भी हिन्दू जाति कई क्षेत्रों में अपना अस्तित्व बचाने में लगी हुई है। इसके कई कारण हैं, इस सच से हिन्दू सदियों से ही मुंह चुराता रहा है जिसके परिणाम समय-समय पर देखने को भी मिलते रहे हैं। इस समस्या के प्रति शुतुर्गमुर्ग बनी भारत की राजनीति निश्चित ही हिन्दुओं के लिए घातक ही सिद्ध हो रही है। पिछले 70 साल में हिन्दू अपने ही देश भारत के 8 राज्यों में अल्पसंख्यक हो चला है।

कश्मीर में हिन्दुओं पर हमलों का सिलसिला 1989 में जिहाद के लिए गठित संगठनों ने शुरू किया था जिनका नारा था- “तुम भागो या मरो” इसके बाद कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ दी। करोड़ों के मालिक कश्मीरी पंडित अपनी पुश्तैनी जमीन-जायदाद छोड़कर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हो गए। असम कभी 100 प्रतिशत हिन्दू बहुल राज्य हुआ करता था किन्तु आज असम के 27 जिलों में से 9 मुस्लिम बहुल आबादी वाले जिले बन चुके हैं, जहां आतंक का राज कायम है पिछले चार दशक से जारी घुसपैठ के दौरान बंगलादेशी घुसपैठियों ने वहां बोडो हिन्दुओं की खेती की 73 फीसदी जमीन पर कब्जा कर लिया अब बोडो के पास सिर्फ 27 फीसदी जमीन है। सरकार ने वोट की राजनीति के चलते कभी भी इस सामाजिक बदलाव पर ध्यान नहीं दिया इसी कारण असम के लोग अब अपनी ही धरती पर शरणार्थी बन गए हैं।

वोट की राजनीति के चलते राजनितिक दलों ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को असम, उत्तर पूर्वांचल और भारत के अन्य राज्यों में बसने दिया। राजनीति के कारण ही बंगाल के कई इलाके मुस्लिम बहुल हो चुके हैं और हिंदुओं का इन इलाकों में जीना भी दूभर हो गया है। राज्य में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है। अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसंख्या का समीकरण बदलकर  दिया है। उन्हें सियासत के चक्कर में देश में वोटर कार्ड, राशन कार्ड जैसी सुविधाएं मुहैया करवा दी जाती हैं और इसी आधार पर वे देश की आबादी से जुड़ जाते हैं और कुछ दिन बाद दूसरे समुदाय की महिलाओं और जमीन पर कब्जे की कोशिश शुरू कर देते है। बंगाल से केरल तक अनेकों खबरें अखबारों से लेकर मीडिया में शोर सुनते आ रहे है।

जम्मू बंगाल और केरल की बात बहुत दूर की है। आज हालात ये हो गये है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में लोगों को असुरक्षा के कारण पलायन करना पड़े, उनके सामने दुर्गा, शिव, राम, हनुमान समेत अन्य हिन्दू देवी देवताओं की झांकियों वाले मंदिर में तोड़फोड़ कर दी जाये। लेकिन इसके बावजूद लुटियंस मीडिया को अब तक दिल्ली में रहने वाले हिंदुओं की पीड़ा नजर नहीं आई। ये वही मीडिया है जो सीरिया और बाग्लादेश के लोगों के पलायन करने पर खूब मातम मनाती है रोहिंग्या को लेकर रोती दिखती है लेकिन जब देश की राजधानी के आसपास हिंदू पलायन करने पर मजबूर हैं तो उसने चुप्पी साध रखी है। सवाल पलायनवादी हिन्दुओं से भी है कि कब तक, कहाँ तक पलायन करेंगे?

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