इस समय वेद व सृषटि समवत 1,96,08,53,115 आरमभ हो रहा है। दवापर यग की समापति पर लगभग 5,000 वरष पूरव महाभारत का परसिदध यदध हआ था। इस परकार लगभग 1,96,08,48,00 वरष पूरव महाभारत यदध तक सारे भूमणडल पर क ही वैदिक धरम व संसकृति विदयमान थी। महाभारत यदध से धरम व संसकृति का पतन आरमभ होता है जो अब से 139 वरष पूरव अपनी चरम पर था। इस समय वैदिक धरम व संसकृति का मूल सवरूप अपरचलित व अजञात हो गया था तथा उसके सथान पर अनध विस, करीतियां, अजञान ने सरवतर अपने पैर पसारे ह थे। निराकार, सरववयापक, सरवानतरयामी, सरवजञ, सरवशकतिमान व सचचिदाननद ईशवर की उपासना न केवल तिहासिक वसत बन कर तिरसकृत हो चकी थी अपित विसमृत भी कर दी गई थी। देशवासियों को पता ही नहीं था कि कभी देश के शत-परतिशत लोग सृषटिकरता ईशवर के निराकार व सरववयापक सवरूप की योग दरशन की विधि के अनसार उपासना करते थे, अंहिसातमक अगनिहोतर यजञ करते थे, जीवित माता-पिता व वृदधों का शरादध व तरपण होता था, मांसाहार वरजित था, मदिरापान बरा माना जाता था, आज जैसा सतरी-परूषों का फैशन तो कभी इस भारत भूमि पर पूरव में था ही नही। जब भारत में पतन की यह सथिति थी तो इसका परभाव सारे विशव पर पड़ना सवाभाविक था। कारण यह कि मनसमृति के अनसार यह देश अगरजनमा मनषयों को उतपनन करता था। संसार भर के लोग अपने-अपने लिये धरम, संसकृति, चरितर व जञान-विजञान की शिकषा लेने इसी देश में आया करते थे। भारत संसार का गरू था। महाभारत यदध के पशचात जब भारत के लोगों ने विशव में धरम-संसकृति-चरितर-जञान व विजञान की शिकषा देने के लि चारों दिशाओं के देशों में जाना बनद कर दिया या यह कहें कि विदेशों में जाना बनद हो गया तो वहां घोर अनधकार फैल गया। सी सथिति में भारत से बाहर परथम पारसी मत का उदय हआ। इसके परचारक व संसथापक महातमा जरदशत थे। पारसी मत का धरम पसतक जनदावसथा है। कया जनद शबद छनद का अपभरंस तो नहीं है? जनदावसथा वेदों से अधिकांशतः परभावित है। इसके बाद ईसा का जनम होने पर उनहोंने अपने परयासों से धरम-संसकृति का अधययन किया, सोचा व विचारा। वह जितना अधययन कर सके, उनके अनरूप उनके शिषयों दवारा करिषचिनियटी या ईसाई मत का परादूरभाव हआ। सवाभाविक था कि धरमविहीन हो चके मनषयों को धरम की आवशयकता थी। अपनी अजञानता के कारण जनसाधारण को जो व जैसा जञान मिला उसे उनहोंने सवीकार कर लिया। उस समय वहां के लोगों के लि यह समभव नहीं था कि वह अपनी विवेक बदधि का परयोग कर सतय व असतय को जान पाते। यह मत भी पललिवित व पोषित होता रहा। हमें अनभव होता है कि इस मत ने ईशवर व जीवातमा का जो सवरूप परसतत किया वह ईशवर व जीवातमा के सतय व यथारथ सवरूप से भिनन है। आज यदयपि जञान-विजञान ने बहत उननति कर ली है, परनत धरम-मत-समपरदायों-मजहबों के सिदधानत व मानयतायें अपरिवरतनीय बनी हई हैं, अतः यह वैसी की वैसी हैं। आज कछ आधनिकता, जञान की उननति व आरय समाज के वेदों के परचार से परभावित होकर उनकी तरक व यकतियों से यकत वयाखयायें करने का परयास किया जाता है। यह यदयपि अचछा है परनत हम अनभव करते हैं कि सभी मतों व धरमो की क-क बात का बहत ही गहराई से विचार कर निरणय करना चाहिये और यदि कोई बात असतय व अवयवहारिक सिदध हो तो उसे आधनिक सतय जञान के परिपरेकषय में संशोधित कर लेना चाहिये। अनावशयक खींच-तान नहीं करनी चाहिये। हमारे वैजञानिक लोग भी निरनतर सा करते आ रहे हैं जिसका परिणाम व परभाव यह है कि आज विजञान आकाश छू रहा है जो कि 100 या 200 वरष पहले अपनी शैशवासथा में था। इसके विपरीत आज विगत 4 से 5 हजार वरषो में उतपनन मत व मतानतर जहां थे, वहीं के वहीं है। उनमें संशोधन का विचार करना भी पाप व अपराध माना जाता है। महरषि दयाननद इस धारणा के विरूदध रहे हैं। उनहोंने परतयेक बदधि के विपरीत बात का संशोधन किया है और आज का वैदिक धरम शायद संसार के बनने के बाद से इस समय सरवोततम मानयताओं व सिदधानतों से समनवित है। भरम न हो इस लिये यह कहना है कि हमारे देश में महाभारत काल तक ऋषियों की परमपरा रही है। हमारे ऋषि अवैदिक कारयो का आरमभ से ही विरोध करते रहे हैं। परनत कितना भी करें कहीं कछ थोड़ा सा हो जाता है जो सिदधानत के पूरणतः अनकूल नही होता। उसका कारण उसका वयवहार करने वाले लोगों का अजञान व किंचित सवारथ भी होता है। समय का चकर चला और अरब कहलाने वाले देशों में मकका नामक सथान पर मोहममद साहब से इसलाम मत असतितव में आया जो समय-समय पर उनके अनयायियों के अंहिसा व हिंसा समनवित परचार से विशव के अनेक सथानों पर फैल गया। यह सथिति तो भारत से दूर के देशों की रही है। भारत में भी पहले यजञों में पश हिंसा आरमभ हई। वरण वयवसथा में गण, करम व सवभाव से चार वरण थे जिनमें क वरण शूदर था। सबको उननति के समान अवसर सलभ थे। छआ-छत व असपरशयता जैसी सामाजिक बराई वैदिक काल में नहीं थी। परनत मधय काल में इसका उदय हआ। इसके कछ कारण अवशय रहे होगें। आज सारा विवरण उपलबध नहीं है। इतना ही कह सकते हैं कि जनम से किसी बराहमण, कषतरिय, वैशय व शूदर मान लेने की वयवसथा वेदों के विरूदध होने से गलत थी। इसके साथ ही शूदरों के परति छआ-छत का वयवहार घोर अमानवीय कारय था व आज भी है यदि कोई सा करता है। से लोगों का मनषय जनम धारण करना सारथक व उददेशय को पूरा करने वाला नहीं कहा जा सकता। सतरी व शूदरों को वेदाधययन से वंचित कर दिया गया। इसका क कारण यह हो सकता है कि हमारे बराहमण व पणडित कहलाने वाले वरग ने सवयं तो वेदों व शासतरों का अधययन करना बनद कर दिया व दूसरों को भी इसके अधिकार से वंचित कर दिया। से अनेक कारणों के उतपनन होने से भारत में बौदध मत व उसके साथ या बाद में जैन मत का परादूरभाव हआ। इनहोंने न केवल यजञों की ही उपेकषा व विरोध किया अपित ईशवर के असतितव को ही असवीकार कर दिया। इसके सथान पर क अवैदिक कारय यह परचलित किया गया कि इन मतों के आचारयो ने अपने मानय परूषों की मूरतियों को बना कर उनकी पूजा व अरचना आरमभ कर दी। ससता सौदा जयादा बिकता है। अतः वैदिक व पौराणिक मत के लोग अपना मत छोड़ कर इन नये नासतिक व वैदिक परमपराओं का विरोध करने वाले मतों की ओर दौड़ने लगे जिससे इन नये मतों के अनयायियों की संखया बढ़ने लगी और वैदिक व पौराणिक मत के अनयायियों की संखया घटने लगी। इसके बाद सवामी शंकराचारयजी का समय आता है।

सवामी शंकराचारयजी भारत के दकषिण परदेश में जनमें। बहत कम आय में ही उनहोंने शासतरीय जञान परापत कर लिया। उनके काल में जैन मत अपना परसार परापत कर चका था। आरयधरम व उसका अजञान समनवित रूप अवनत अवसथा को परापत था। उनहोंने सनातन धरम की जब यह अवसथा देखी तो उनमें भी धरम रकषा का भाव आया। उनहोंने जैन मत की मानयताओं व सिदधानतों का अधययन किया तो उनहें सतय की कसौटी पर असफल पाया। उनहोंने इनके पराभव व आरयधरम की उननति पर विचार किया। उन दिनों देश की राजधानी उजजैन में शासन कर रहे राजा जैन मत के अनयायी थे। उनसे मिलकर उनहोंने उनहें अपनी मानयताओं व सिदधानतों का परिचय कराया और उनहें समाया कि राजा का करतवय है कि वह सतय धरम की उननति के लि विदवानों में शासतरारथ की वयवसथा करें और जो मत शासतरारथ में सतय सिदध हो उसे सवयं भी सवीकार करें और परजा से भी कराये। राजा सधनवा उनके विचारों से सहमत हो गये, शासतरारथ हआ। जैन मत पराजित हआ तथा सवामी शंकराचारय का अदवैतमत विजयी रहा। राजा ने अपना करतवय मानकर जैन मत को छोड़कर सवामी शंकराचारय दवारा परवरतित आरय धरम के उनके अदवैत-सवरूप को सवीकार किया। उसके बाद देश भर मे बौदध व जैन मत पराभूत हआ और केशवरवाद का परतिपादक अदवैत मत परवरतित हआ। सवामीजी ने देश के चारों दिशाओं में धरम परचारारथ चार मठ सथापित किये जो आज भी संचालित है। इस घटना के बाद बौदध व जैन मत के परभाव व जनसामानय की अविवेकपूरण रूचि के अनसार तथा सवामी शंकराचारय जी के समान गमभीर विदवानों व परचारकों की अनपसथिति के कारण मूरतिपूजा आदि अवैदिक मानयताओं से यकत आरयधरम परचलित रहा व इसमें दिन-परतिदिन अनधविशवास व पाखणडों की वृदधि होती रही। इसके बाद के समय में मूरति पूजा को महिमामणडित करने के लि पराणों की रचना भी हई और देश वेद के सतय मारग से हट कर मूरतिपूजा, फलित जयोतिष, मृतक शरादध, असपरशयता, बाल विवाह, बेमेल विवाह, मांसाहार, मदिरापान जैसी अनेक बराईयों का परचलन होकर समाज दिन परतिदिन अवनति को परापत होता रहा। इस सबके परिणाम सवरूप 8-वीं शताबदी में पहले भारत यवनों का व बाद में अंगरेजों का गलाम बना। इन दिनों भारत में आरय धरम के अनयायियों का न धरम सरकषित रहा न मान-मरयादा और न आतम-सममान ही। इतनी जलालत देखनी पड़ी की जलालत को भी शरम आ जाये। इन सभी विदेशी विधरमी लोगों ने जो कछ किया वह मानवता के विरूदध था तथा अपवादों को छोडकर, पाशविक परवृति के अमानवीय कारयों की शरेणी में आता है।

अंगरेजों ने भारत को सवतनतरता अपनी इचछा से परदान नहीं की। भारत को सवतनतर करना उनकी मजबूरी थी। आज भी उनहोंने कछ थोड़े से देशों को गलाम बना रखा है, सी जानकारी नैट पर उपलबध है। वह कौन सी मजबूरी है जिस कारण अंगरेजों को भारत को सवतनतर करना पड़ा तो हमें लगता है कि दवितीय विशव यदध के परिणामों के कारण उनको भारत से जाने का निरणय करना पड़ा। नेताजी सभाष चनदर बोस ने भी कम चनौती नहीं दी। हमारे करानतिकारियों ने भी अंगरेजों की नींद हराम कर रखी थी। वह जान चके थे कि अंहिसातमक आनदोलन का सीमित परभाव है परनत करानतिकारी तो उनके बड़े-बड़े अधिकारियों तक के पराण ले रहे थे। हमें लगता है कि इंगलैणड व भारत के बीच की जो दूरी थी और समदरी मारग में जो कठिनाईयां होती हैं वह भी क कारण हो सकता है। हमारी सेनाओं में भी आजादी की भावना व विचार घस चके थे। सैनिक व सिपाही मंगल पाणडे का उदाहरण तो सामने है ही। हमें लगता है कि भविषय में अंगरेजों को भारतीय सेना के जवानों से भी खतरा नजर आता था। अंहिसातमक आनदोलन से भी उनहें किंचित कषट तो होता ही था परनत यह सीमित व अधिक विचलित करने वाला नहीं था। अंगरेज यह भी जानते थे कि गांधीजी जब तक हैं तब तक ही शायद अंहिसा की नीति पर भारत चल रहा है, बाद में कया होगा इसके परति अंगरेजों में अनिशचितता थी और वह इससे परेशान थे। अंगरेजों को समभवतः लगा कि वह समय ही उनके लि उपयकत है। बाद में यदि परिसथितियां खराब होगीं तो उनहें छोड़ना तो पड़ेगा परनत शायद वह उनके लि अधिक दःखदायी हो। आजादी के आनदोलन की दोनों धाराओं, करानति व शानति या अंहिसातमक, को पोषण आरय समाज से ही मिला। सबसे पहले सवतनतरता व आजादी का विचार कहां से आया तो इसके लि महरषि दयाननद के साहितय में अनेक उललेख मिलते है। सतयारथ परकाश के अषटम समललास का उललेख कि ‘कोई कितना ही करे परनत जो सवदेशीय राजय होता है, वह सरवोपरि उततम होता है। अथवा मतमतानतर के आगरह-रहित, अपने और पराये का पकषपातशूनय, परजा पर माता-पिता के समान कृपा, नयाय व दया के साथ विदेशियों का राजय भी पूरण सखदायक नहीं है।’ यह वाकय सवामी दयाननद ने कांगरेस की सथापना से 10 वरष पूरव सन 1875 में सतयारथ परकाश में लिखे थे। इसके अतिरिकत सतयारथ परकाश में अनय सथानों पर, उनके अनय गरनथों यथा आरयाभिविनय, संसकृत वाकय परबोध आदि में भी सवदेशीय राजय का मारमिक शबदों में उललेख किया गया है। हमें लगता है कि महरषि दयाननद के यही शबद भावी सवतनतरता आनदोलन के सूतर वाकय या आधार सतमभ बने। सवामी दयाननद की देश भकति का क पहलू यह भी है कि वह सन 1824 में अपने जनम से लेकर सन 1857 की परथम करानति तक का उललेख तो करते हैं, परनत सन 1857 से कछ पहले व 1860 तक का विवरण अपने अनयायियों को नहीं बताते। सतय कछ भी हो परनत यह रहसयमय है। 1857 में अपनी भूमिका या अनय कारयो का विवरण न देना रहसय को जनम देता है। न बताने के पीछे का कारण भाग लेना हो सकता है। यदि न लेते तो वह विवरण अवशय देते जिसका कारण कि उनहोंने उससे पूरव व पशचात का विवरण दिया है। सन 1857 में महरषि दयाननद 33 वरष के यवा थे। से यवक थे जो विगत 15 वरषों से देशभर में घूम कर साध-संनयासी-योगी-विदवानों को ढूंढ रहा था, उनसे जञान परापत कर रहा था तथा देश की सथिति को देख रहा था। कया सा वयकति देशभकति के कारयो से दूर या उदासीन रह सकता है, हमारा अनमान है कि कभी नहीं? किसी भी करानतिकारी ने अंगरेजों के शासनकाल में अपने कारयो का विवरण नहीं दिया। विवरण न देने से कोई करानतिकारी, करानतिकारी नहीं रहता, सा कोई सवीकार नहीं करेगा। इससे सवामी दयाननद के क देशभकत व करानतिकारी या उनका सहयोगी या फिर उनके परति सहानभूति रखने वाला तो हो ही सकता है। हमें तो यहां तक भी लगता है कि करानति के गपत सूतरधारों में से कहीं वह क न रहे हों, इसी कारण वह परदे के पीछे रहे और उनहोंने अपने कृतयों को गपत रखा कयोंकि उसका उललेख करने का अरथ था कि उनके जीवन करम की समापति। बताया जाता है कि कांगरेस के इतिहास लेखक शरी सीताभिपटटारमैया ने लिखा है कि आजादी के आनदोलन में भाग लेने वाले आरय समाज के अनयायियों की संखया कल आनदोलनकारियों की 80 परतिशत थी। यदि आरय समाज की सथापना न हई होती तो इन लोगों के आनदोलन में भाग न लेने से आनदोलन का परभाव उतना ही कम होता फिर सवतनतरता का लकषय पूरा होता या नहीं, कहा नहीं जा सकता। यह भी उललेखनीय है कि अंहिसातमक आनदोलन के परणेता गोपाल कृषण गोखले थे। महातमा गांधी इनहीं के शिषय थे। गोखलेजी महादेव रानाडे के शिषय थे जो कि सवयं को महरषि दयाननद का शिषय मानते थे और यह सरवविदित भी था। उपरयकत अनेक कारणों से अंगरेजों ने भारत को छोड़ने का निरणय किया। 15 अगसत, 1947 को अंगरेज भारत का विभाजन कर, उसके दो खणड, क भारत व दूसरा पाकिसतान, करके अपने देश इंगलैणड रवाना ह।

आरय समाज की सथापना 10 अपरैल सन 1875 को ममबई में हई थी। इससे पूरव ही सवामी दयाननद सरसवती पूरे देष में घूम घूम कर वेद परचार कर रहे थे। उनहोंने काशी में मूरति पूजा के विरूदध वहां के सभी पणडितों से क साथ शासतरारथ भी किया था। इस शासतरारथ में विजय से उनकी कीरति दिग-दिगनत फैल गई थी। उनका पकष था मूरतिपूजा व अनय उपासनायें सचची ईशवरोपासनायें नहीं है। सचची ईशवरोपासना योग की रीति से ईशवर के सरववयापक, सरवजञ, सरवशकतिमान, सरवोपकारक, सरवानतरयामी, सचचिदाननद आदि असंखय व अननत गणो वाले सगण व निरगण सवरूप का धयान व चिनतन करके की जाती है। सवामी दयाननद ने सारे संसार को ईशवर की सचची उपासना का जञान व विधि परदान की। इस कारण वरतमान व भविषय में उनका यह योगदान सा अनोखा कारय है जिसके लि सारा विशव उनका सदा-सदा के लि ऋण

ALL COMMENTS (0)