सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार संध्या और अग्निहोत्र प्रातः - सायं  दो ही काल में करें। दो ही रात दिन की सन्धिवेला है, अन्य नहीं। मनुस्मृति में लिखा है प्रातःकाल की संध्या, गायत्री का जप करता हुआ, सूर्य दर्शन होने तक स्थित होकर और सायंकाल की संध्या नक्षत्र दर्शन होने तक स्थित होकर और सायंकाल की संध्या नक्षत्र दर्शन ठीक ठीक होने तक बैठकर करें प्रभु ने ओ३म् नाम की फसल बोने का समय चैबीस घण्टे में दो बार बनाया है।

 ब्रह्म का उपासक मनुष्य, रात्रि और दिवस के सन्धि समय में नित्य उपासना करें, जो प्रकाश अप्रकाश का संयोग है। वही संध्या का काल जानना और उस समय में जो संध्योपसना की ध्यान क्रिया करनी होती है वही संध्या है सन्धि वेला का अर्थ है जब न दिन हो, न रात, देखो सूरज छिप गया है, यह संध्या का समय है। प्रातः पौ फट रही है उजाला आ गया है, सूरज अभी उदय नही हुआ है, तो न रात है और न दिन है यह भी संध्या का समय है। प्रभु भक्ति की फसल बोने का, संध्या की फसल बोने की ये दोनों बेला ही उत्तम ऋतु है।

मन को वर्तमान में लगा ओ३म् नाम का बीज बो लो तभी फसल समय से पकेगी, अर्थात् जीवन के अन्त में मुख से ओ३म् नाम निकलेगा और जीवन सफल हो जायेगा।

मनुस्मृति के अनुसार प्रातःकाल की संध्या के जप से रात्रि भर की और सायंकाल की संध्या से दिनभर की दुर्वासनाओं का नाश होता है। महर्षि मनु के अनुसार दिन भर जो भी कुविचार मन में कभी उत्पन्न हों उनके संस्कार को सायंकाल की संध्या के समय अच्छे प्रकार धो डालो और इसी प्रकार से रात्रि के कुविचारों के संस्कारों को प्रातःकाल की संध्या से दूर कर दो। इसका अर्थ यह हुआ कि मनुसय को अपने मन और इन्द्रियों आदि की खोज करनी चाहिये कि उनमें आज के दिन व रात्रि में पाप का कहीं धब्बा तो नहीं लग गया है और यदि कहीं ऐसा कोई दोस दिखलाई दे तो उसे उसी समय धो डालें ऐसा करने से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल होता है।

 

किन्तु आज के भाग दौड़ के जीवन में यदि कोई मनुष्य विशेष कारण से ऊपर लिखित नियत समयों पर संध्या न कर सके तो उसे जिस समय भी अवकाश हो और सब प्रकार के झमेलों को परे फेंक कर ध्यानावस्थित हो सके, संध्या कर लेनी चाहिये। क्योंकि न करने से अच्छा ही है। सन्धिवेला का समय अति रमणीय होने के कारण भी ईश्वर का ध्यान लगने में सहायक है।

मनुस्मृति के आधार पर स्वामी दयानन्द जी ने लिखा है

जो मनुष्य नित्य प्रातः और सायं संध्योपासन नहीं करता उसको शुद्र के समान समझकर द्विजकुल से अलग करके शुद्र कुल में रख देना चाहिये। वह सेवा कर्म किया करे और उसके विद्या का चिह्न यज्ञोपवीत भी न रहना चाहिए। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि सब कामों में इस ब्रह्म को मुख्य मानकर पूर्वोक्त दो समयों जगदीश्वर की उपासना नित्य किया करें।

क्या योग के आठ अंगो की संगति संध्या में है?

===================================

उत्तर - हाँ संध्या में योग के आठ अंगों की संगति है।

जैसे-

1.       उद्देश्य सुख व शान्ति प्राप्ति करना आचमन।

2.      हम जीवन में स्वस्थ, नीरोग व सबल बनें, अंग स्पर्श, मार्जन मन्त्र, शारीरिक व आत्मिक बल के लिए प्रार्थना।

3.      जीवन में पवित्रता के लिए प्राणायाम।

4.      मानसिक पापों की निवृति अघमर्षण मन्त्र।

5.      मन में द्वेष भाव की समाप्ति व ईश्वर प्राप्ति के लिए मनसा परिक्रमा।

6.      मानस अहंकार व ईश्वरीय गुणों की प्राप्ति अपस्थान मन्त्र।

7.      ईश्वरीय गुणों के प्रभाव से आत्मसमर्पण करना व नमस्कार मन्त्र।

अष्टांग योग के आधार पर समाधि पर्यन्त सिद्धि प्राप्ति के लिये वैदिक संध्या की विधि प्राचीन ऋषि महर्षियों ने प्रचलित की। इसकी साधना से क्रमश: मनुष्यत्व, आर्यत्व, आर्षत्व एवं देवत्व की स्थिति प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्त होता है। वैदिक संध्या ही अष्टांग योग का क्रियात्मक एवं व्यवहारात्मक रूप है, अतः यही ब्रह्म का बोध कराने की सामर्थ्य रखती है।

--विकास आर्य

ALL COMMENTS (0)