बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने मुंबई में अपने घर में फांसी लगाकर जान दे दी है. सुशांत सिंह जवान जवान था अभी 34 साल का ही था. मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि पिछले छह महीनों से डिप्रेशन से गुजर रहा था और अब अवसाद ज्यादा बढ़ने के कारण अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर ली.

सुशांत सिंह का निधन अपूरणीय क्षति है. चारों ओर शोक की लहर है. हर कोई अपने तरीके से उनको श्रद्धांजलि दे रहा है. ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सप्प पर उनकी फिल्मों और सीरयलस के सीन के साथ लोग अपने दुःख को व्यक्त और साझा कर रहे है.

भारत के कई बड़े न्यूज पेपर और पोर्टल भी अपनी श्रद्धांजलि प्रदान कर रहे है, न्यूज 24 ने लिखा रिप सुशांत सिंह राजपूत, एक्टर की मौत के बाद बालीवुड में पसरा सन्नाटा, इसके अलावा नई दुनिया अखबार ने लिखा रिप सुशांत सिंह राजपूत सुशांत की मौत की खबर सुनकर बेसुध हुए पिता... इसके अलावा हिन्दुस्तान टाइम्स और  टाइम्स नाउ समेत सभी ने रिप सुशांत सिंह राजपूत लिखकर श्रद्धांजलि और अपनी खबर प्रकाशित की.

तेजी से भागती दौडती जिन्दगी और इंटरनेट की दुनिया में आज प्रत्येक वर्ड का शॉर्टकट प्रयोग किया जाने लगा है, जैसे गुड मोर्निंग के लिए सिर्फ जी एम लिख देते और गुड नाईट के लिए जी एन लिख देते है इसी तरह से एक शब्द है रेस्ट इन पीस इस शब्द के लिए आर आई पी यानि रिप का प्रयोग किया जाता है, लगभग 8 वीं शताब्दी के दौरान किसी के मरने पर उसे दफनाते हुए यह वाक्य ईसाई कैथोलिक अंतिम संस्कार समारोहों का एक हिस्सा बना. उसके लिए एक विशेष प्रार्थना की जाती थी,

यानि रिप लेटिन भाषा का एक ऐसा शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है शान्ति से आराम करो. अब तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है मतलब ये आत्मा के लिए नहीं है रिप शब्द शरीर के लिए है क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी जजमेंट डे अथवा कयामत का दिन आएगा, उस दिन कब्र में पड़े ये सभी शव दोबारा जीवित हो जायेंगे तब तक उस दिन के इंतजार में रेस्ट एंड पीस यानि शान्ति से आराम करो.

कुछ शब्दों का चलन बिना विचारे तेजी से फैल जाता है अधिकांश लोग उन्हीं का प्रयोग करने लगते है कुछ को पता नहीं और कुछ आधुनिक बनने की होड़ में ऐसा करते है. ईसाई समुदाय और मुस्लिम समुदाय में पुनर्जन्म को नहीं माना जाता उनके अनुसार इन्सान एक बार जन्म लेता है और मरने के बाद कब्र में जजमेंट डे या कयामत तक इंतजार करता है. लेकिन सनातन धर्म और विज्ञान इस बात के पक्ष में नहीं है, इनका मानना है कि आत्मा कभी आराम नही करती, मृत्यु के पश्चात दूसरा जन्म तीसरा जन्म जब तक आत्मा बहुत महान कार्य करके मोक्ष तक नहीं जाती तब तक उसकी यात्रा जारी रहती है.

गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी कहते है कि आत्मा का कोई पड़ाव नहीं होता उसकी यात्रा अनंत है. अभी तक जब हमारे किसी प्रिय रिश्तेदार मित्र सगे संबधी की मौत हो जाती थी तो हम कुछ इस तरह अपनी संवेदना व्यक्त करते थे...

जैसे प्रिय चाचा जी का असमय हमारे बीच से जाना बहुत ही दुखद है, उनके साथ बिताये पल सदैव हम सबको उनकी याद दिलाते रहेंगे , अच्छे मनुष्य की शायद कही और हमसे ज्यादा आवश्यकता हो

या फिर इस तरह कि मैं आपको और आपके परिवार को हमारी गहरी और सबसे गंभीर संवेदना देना चाहता हूं और आपके दादाजी की ज्ञान से परिपूर्ण बातें सदैव हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी ईश्वर दिवंगत आत्मा को सद्गति प्रदान करें..

असल में मृत्यु सत्य है और शरीर नश्वर हैं, यह जानते हुए भी अपने बीच से किसी अपने के जाने का हम सभी को बेहद कष्ट होता हैं. हम अपने ह्रदय तल से शब्दों को अपनी भावनाओ में प्रकट करते है तथा शोकाकुल परिवार को हिम्मत देते है और हर एक घड़ी में उनका साथ देने का विश्वास भी हम लोग उन्हें दिलाते है...

लेकिन आजकल किसी को अपने धर्म और संस्कृति के बारे में कुछ समझाओ तो लोग आपको कट्टरता से रूढ़ीवाद जोड़ देते है. रिप संस्कृति मोबाइल जनरेशन की एक सबसे बड़ी नासमझी या कॉपी-पेस्ट संस्कृति का नतीजा है. शायद रिप लिखना उनके लिए बुरा नहीं होता होगा वो शरीर में विश्वास करते है शरीर की शांति के लिए कह सकते है है लेकिन यदि मृतक कोई सनातन धर्म या जैन, बौद्ध या सिख धर्म का हो तो यह गलत है क्योंकि हम शरीर में नहीं आत्मा के सिधांत को मानने वाले लोग है.

आप ईसाइयों की कब्रों पर देखिये वहां मोटे मोटे अक्षरों में लिखा होता है रिप यहीं से इसका प्रसार और प्रचार मिशनरीज और कान्वेंट स्कूलों से होता हुआ आज हर ओर फैल चुका है. ईसाई धर्म पुनर्जन्म में तो यकीं नहीं करता तो वो पुनरुत्थान को मानता है. पुनर्जन्म और पुनरुत्थान में अंतर है. जहां एक ओर पुनर्जन्म में हम शरीर की नहीं आत्मा की बात करते हैं तो वहीं दूसरी ओर पुनरुत्थान में आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती. वहां शरीर होता है जिसे दफनाया गया है और वह शरीर फिर एक दिन जिन्दा हो जायेगा.

वहीं दूसरी और सनातन धर्म को मानने वाले मानते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अजर अमर है इसलिए शरीर को पंचतत्वों में विलीन करने हेतु उसे जलाया जाता है. तो रिप का कोई मतलब ही नहीं बनता. गीता में तो आत्मा के लिए स्पष्ठ कहा गया है नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

अर्थात इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकती है.

सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर आत्मा अपनी यात्रा में निकल जाती है, या मोक्ष प्राप्त कर परब्रह्म में विलीन हो जाती है. हम यह मानते हैं कि आत्मा अमर है और वो पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर में चली जाती है या मोक्ष प्राप्त कर परब्रह्म में विलीन हो जाती है. सनातन धर्म में रिप जैसा कुछ भी नहीं. यह तो उस दिवंगत आत्मा को एक प्रकार से कोसना हुआ कि तू यहीं पड़े रह बताओ कोई अपने प्यारे सगे सम्बन्धी के लिए ऐसा भी भला कोई करता है. हालाँकि सुशांत सिंह ने अंत समय में जिस रास्ते का चुनाव किया वह रास्ता सही नहीं था, आप अच्छे अभिनेता थे लेकिन युवाओं के हीरो नहीं बन पाए.

RAJEEV CHOUDHARY

 


 

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