काठियावाड़ की मोरवी रियासत में क छोटे से कसबे टंकारा में शरी करषण तिवारी जी के घर क बालकका जनम हआ जिसका नाम मूलशंकर रखा गया था। मूलशंकर ने संसकृत का अधययन किया और वेदों को कणठसथ करने का अभयास परारमभ किया। यजरवेद उनहे कणठसथ हो गया और अनय वेदों के भी अधिकतर मनतरों को उनहोंने याद कर लिया। मूलशंकर के जीवन में कछ सी घटनायें हईं कि वे घर से निकल कर सचचे शिव की तलाश और मृतय से छूटने के उपाय के लि संनयास के मारग पर चल पडे़। वह क सचचे गर की तलाश करने लगे और अनत में उनहें विरजाननद के रूप में वयाकरण के परकाणड विदवान मिले जो पराचीन शासतरों में भी बड़ी निषठा रखते थे।

 

वे अनधविशवास और दकियानूसी परथाओं के घोर विरोधी थे। अपने शिषय को सवामी विरजाननद ने न केवल अपने इन गणों से ससजजित किया अपित उनमें राषटरपरेम और वेदानराग की भावना कूटकूट भर दी। योगय गर की अनकमपा से दयाननद क परकाणड पणडित और निपण तरकशासतरी बने। विदयाधययन समापत होने के बाद सवामी विरजाननद ने अपने शिषय दयाननद को अपना जीवन देश को समरपित करते ह उपकार करने, सत शासतरो का उदधार करने, अविदया को मिटाने और वैदिक धरम फैलाने का आदेश दिया। अपने गर को दि ह वचनों का पालन करते ह वे अपने करतवय पथ पर चल पडे़। अपरैल 1867 में कमभ के मेले से उनहोंने समाज सधार का कारय आरमभ किया। समाज में वयापत पाखणड, अनधविशवास, करीतियों, गरडम, आडमबर, जातिवाद, सतीपरथा, बालविवाह आदि कपरथाओं के विरदध उनहोंने सारे देश के भिनन-भिनन सथानों में घूमघूम कर घोर परचार करते ह आवाज बलनद की। अपने विचारों को महरषि ने सतयारथपरकाश नामक अपने कालजयी गरनथ में उललिखित किया और 10 अपैल 1875 को इस  उददेशय से उनहोंने आरय समाज की सथापना की। सवामी दयाननद की यह क बड़ी देन है कि भूले ह वेदों का उनहोंने फिर से परिचय कराया और वेदों के जञान को समसत भारतवासियों की विदया का मूल कारण बताया । उनहोंने न केवल वेदों का भाषय किया अपित ऋगवेदादिभाषय-भूमिका, आरयाभिविनय, संसकारविधि आदि अनेक गरनथ लिखे। महरषि  के हृदय में मातृभूमि का सरवोपरि सथान था और देश परेम की भावना उनमें कूटकूट कर भरी हई थी।  अपने अमर गरनथ सतयारथपरकाश के गयारहवें समललास में वे लिखते हैं कि ‘‘यह आरयावरत देश सा है, जिसके सदृश भूगोल में दूसरा देश नहीं है। इसीलि इस भूमि का नाम सवरणभूमि है, कयोंकि यही सवरण आदि रतनों को उतपनन करती हैं।‘‘ महरषि भारत को सब परकार से समपनन देश बनाकर इस का उतथान करना चाहते थे। उनका लकषय देश को अतीत का गौरव परापत कराकर सदृढ़ और ससंसकृत राषटर बनाना था। राषटर की रकषा के लि वे पांच ‘सवकार‘ अनिवारय मानते थे़ :

1-सवसाहितय- महरषि की सवसाहितय में अटूट आसथा थी। वे वैदिक वाडमय के अंगभूत गरंथों को ही साहितय का मूलाधार मानते थे। इनहें वे आरष गरंथ कहते थे। उनके अनसार वेद, वेदांग, समृति, दरशन, रामायण और महाभारत हमारे सवसाहितय के अनमोल रतन हैं।

 

2-सवसंसकृति- संसकृति शबद का बहत वयापक अरथ है। संसकृति मानव के समपूरण वयवहार की परिचायक होती है। इसमें हमारी जीवन चरया और विचार पदधति में कला, साहितय, भाषा, धरम, मनोरनजन और विशवास आदि परतिबिमबित होते है। सवामी जी पराचीन आदरशें के उपासक थे परनत वे अंधविशवासों, रढि़यों और पाखणडों को भारतीय संसकृति का अंग नही मानते थे। भारतीय संसकृति के परातन मानदणडों-वरणवयवसथा (गण करम सवभवानसार), अधयातमवाद (केशवरवाद) आशरम वयवसथा मोकष, अहिंसा अपरगरिह, यजञ, तयाग और योग में उनकी बड़ी आसथा थी।

 

3-सवभाषा- दयाननद पहले भारतीय विचारक थे जिनहोंने यह अनभव किया कि भारत को क राषटरभाषा की आवशयकता है। इसलि मातृभाषा गजराती होते ह भी उनहोंने सभी पसतकें हिनदी में लिखकर हिनदी को मातृभाषा के रूप में विकसित करने में महतवपूरण भूमिका अदा की।

 

4- सवधरम- महरषि दयाननद की सवधरम पर अटूट शरदधा थी। उनके अनसार भारत का पराचीनतम धरम वैदक धरम है। यह पूरणरप से आसतिक भाव लि ह केशवरवादी है। वैदिक धरम के अनसार परमेशवर किसी मठ मनदिर गिरजाघर या गरदवारे में बनद नहीं है, अपित वह सरवतर विदयमान है। यह मानवतावादी धरम है।

 

5- सवदेश-सवदेश परेम और सवदेशाभिमान के बिना  हम अपनी असमिता की रकषा नहीं कर सकते हैं। राषटरीयता का क महतवपूरण पहलू सवशासन का सिदधानत माना जाता है। बरिटिश पारलियामेणट ने क कानून, (गवरनमैंट आफ इनडिया कट,1858) पास करके भारत के शासन-तनतर को ईसट इनडिया कमपनी से लेकर सीधा अपने अधीन कर लिया था। 1 नवमबर 1858 को ततकालीन वायसराय और गवरनर जनरल लारड केनिेग ने दरबार में महारानी का क घोषणापतर पढ़  कर सनाया जिसमें कहा गया था-‘‘हमारी परबल इचछा है कि अब हम भारत में शानतिपूरण उदयोगों को परोतसाहन दें, जनोपयोगी और उननति के कारयो को आगे बढ़ायें और अपनी परजा की के हित की दृषटि से कारय करें। उनकी समृदधि ही हमारी शकति होगी, उनकी संनतषटि ही हमारी सरकषा होगी और उनकी कृतजञता ही हमारा परषकार होगा।‘‘ महरषि दयाननद सरसवती ने अपने कालजयी गरनथा सतयारथपरकाश में कहा कि विदेशियों का राजय चाहे वह माता-पिता के समान नयाय और दया से यकत कयों न हो, कभी हितकारी नहीं हो सकता है। सन 1874 में लिखे गये गरनथ आरयाभिविनय में महरषि दयाननद ने अपनी भावनायें ने इस परकार परकट कीं थीं-‘‘अनयदेशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न हों।‘‘ उस समय तक सवराजय का विचार किसी भी राजनेता या विदवान के दिमाग में नहीं आया था। कांगरेस के भीषम पितामह दाभाई नौरोजी ने सरवपरथम 1906 में ‘‘सवराजय‘‘ शबद का उचचारण किया था और होमरूल आनदोलन के दिनों में इस शबद का खलकर परयोग होने लगा था। कांगरेस के 1916 में लखनऊ में ह अधिवेशन में लोकमानय तिलक ने ‘‘सवराजय के जनमसिदध अधिकार‘‘‘ की घोषणा की और 1928 के लाहौर अधिवेशन में कांगरेस ने पूरण सवराजय परापत करने के लकषय की घोषणा की थी परनत महरषि दयाननद ने इससे कई वरष पूरव ही सवराजय के विचार को न केवल परचारित किया अपित अपने अनयायियों ‘में राषटरपरेम की भावनाये भर दीं जिसके फलसवरूप देश के अनेक नौजवान सवतनतरता संगराम में कूद पडे़। सन 1919 में भारत के सवाधीनता संगराम के इतिहास का नया अधयाय आरमभ हआ। बरिटिश राजनीतिजञों दवारा परथम विशवयदध के अवसर पर लोकतंतर, राषटरीयता और सव-भागय निरणय का समरथन करने वाले सिदधानतों की घोषणां कीं गईं थीं।

 

उनके दधारा भारतीय जनता को आशवासन दिया गया था कि यदध के समापत होते ही वे भारत में उततरदायी शासन दि जाने के समबनध में कोई महतवपूरण निरणय लेंगे परनत सन 1919 में गवरनमैंट ऑफ इनडिया कट दधारा जिन शासन-सधारों की घोषणा की गई उनसे जनता संतषट नहीं हई। रोलेकट कट के दमनकारी कानून का विरोध करने हेत सवामी शरदधाननद ने तार दधारा अपने सहयोग देने की सहमति परदान की थी। दिलली सतयागरह के संचालन के लि क कमीटी गठित की गई। इसके क तिहाई से अधिक सदसय आरय सभासद थे। दिसमबर सन 1919 में कांगरेस का वारषिक अधिवेशन अमृतसर में हआ जिसकी सवागतकारिणी समिति के अधयकष सवामी शरदधाननद चने ग थे। अपने अधयकषीय भाषण में उनहोंने अछूतोदधार पर बहत जोर दिया। उनका कहना था कि देश की सवतनतरता के लि उन बराइयों को दूर करना आवशयक है जिनके कारण देश गलाम बना था। उनहोंने असपृशयता निवारण को कांगरेस के कारयकरम में सममिलित कराया। उनका हिनदी में भाषण देना भी क करानतिवीर कदम था। सितमबर 1920 में कांगरेस का विशेष अधिवेशन कलकतता में हआ जिसमें गांधी जी ने असहयोग आनदोलन का परसताव रखा था।

 

इस आनदोलन ने वयापक रप धारण किया। आनदोलन चलाने के लि धन की आवशयकता थी। महातमा गांधी ने इसके लि तिलक फणड बनाकर धनराशी कतर करने की अपील की थी। गरकल कांगड़ी के विदयारथी तिलक सवराजय फणड कतर करने के लि निकल पड़े थे। सवामी शरदधाननद ने भी इस असहयोग आनदोलन में उतसाहपूरवक भाग लिया। महातमा गांधी के इस असहयोग आनदोलन को शरदधाननद और अनय आरय नेता महरषि दयाननद दधारा परदरशित मारग के अनरप ही मानते थे इसलि वे बड़ी संखया में सममिलित ह और उनहोंने अपनी पूरण शकति लगा दी थी। भारत को अनततोगतवा 15 अगसत 1947 को सवतनतरता परापत हई ।

 

भारतीय सवतनतरता संगराम में महरषि दयाननद क लाखों अनयायियों ने तन, मन, धन और अपना जीवन तक निछावर कर दिया इनमें लाला लाजपतराय, म.जी.रानाडे, सवामी शरदधाननद, भाई परमाननद, शयामजी कृषण वरमा, इनदर वाचसपति, भगवतीचरण, भगतसिंह, रामपरसाद बिसमल, रोशन सिंह गेंदालाल दीकषति, मदनलाल धींगड़ा, भाई बालमकनद, मरलीधर, देशबनध गपता आदि परमख हैं। इन समसत सवतनतरता सेनानियें के बलिदान के लि राषटर सदा ऋणी रहेगा। 

 

ALL COMMENTS (0)